संपादकीय दिसंबर 2012
वर्तमान समय भारतीय राजनीति के लिए बहुत ही उथल-पुथल वाला है। आये दिन बेहतर राजनैतिक विकल्प देने के नाम पर नये-नये दलों का गठन हो रहा है। ये नये दल कितना अच्छा राजनैतिक विकल्प दे पायेंगे – ये तो वही जाने, किंतु कहीं न कहीं से इस बात का संकेत अवश्य मिलता है कि भारतीय राजनीति में एक अजीब तरह की शून्यता है। कोई दल भ्रष्टाचार में लिप्त है, तो कोई सांप्रदायिक राजनीति में विश्वास करता है, तो कोई क्षेत्राीय एवं जातीय मुद्दों को हवा दे रहा है। हालांकि, भ्रष्टाचार के बारे में अब कोई दल यह नहीं कह सकता है कि वह दूध का धुला है। भ्रष्टाचार के मामले में कमोवेश एक बात यह देखने को मिल रही है कि सभी दल बराबरी पर आकर खड़े हो गये हैं। हालांकि, भारतीय जनता पार्टी आज भी भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ रही है किंतु व्यावहारिक धरातल पर वह अन्य दलों से भले ही अलग न हो।
भारतीय राजनीति में ये सब बातें चाहे जिस तरफ इशारा करें, किंतु हाल के कुछ वर्षों में प्रमुख रूप से एक बात यह देखने को मिल रही है कि राजनीति तो अब संबंधों पर आधारित हो गई है। संबंधों की राजनीति का आशय इस बात से है कि राजनैतिक दलों में जिसके संबंध आकाओं से हैं, वह राजनैतिक मोर्चे पर कामयाब है। जिन दलों में कार्यकर्ताओं की पूछ होती थी, अब वहां भी पैसे वालों का बोलबाला है। जो कार्यकर्ता गली-मोहल्ले में घर-घर जाकर प्रचार-प्रसार करता हे, उसका मूल्यांकन करने के लिए कोई ठोस मैकेनिज्म नहीं है। जो कार्यकर्ता नेताओं के इर्द-गिर्द मंडराते रहते हैं, उन्हें नेता अच्छी तरह जानते-पहचानते हैं। नेताओं के जन्म दिन वगैरह पर जो कार्यकर्ता शुभ कामनाएं देने के लिए पहुंचते रहते हैं, वे राजनैतिक मोर्चे पर कामयाब हैं।
आम कार्यकर्ताओं की भाषा में इसे आला दर्जे की चापलूसी कहते हैं। वैसे तो नेता जब सार्वजनिक मंचों पर भाषण देते हैं तो यही कहते हैं कि पार्टी में चापलूसों के लिए कोई जगह नहीं है किंतु वे भी इसी चापलूसी को पसंद करते हैं। यदि नेता चापलूसी पसंद करना छंबोड़ दें तो नेताओं के इर्द-गिर्द मंडराने वाले कार्यकर्ता गली-मोहल्ले में आम जन की सेवा में लग जायेंगे। पार्टी में पद की जरूरत हो, तो संबंधों की आवश्यकता, टिकट लेना हो तो भी संबंधों की जरूरत। सरकार बनने पर मंत्राी बनने की बात आये, तो भी संबंधों की आवश्यकता। कोई जमीनी कार्यकर्ता कितना भी अच्छा हो, यदि उसके बड़े नेताओं से संबंध न हों तो वह कुछ भी हासिल कर सकता है।
संबंधों के अलावा राजनीति में परिवारवाद इतना बढ़ चुका है कि सारी काबिलियत अपने परिवार में ही नजर आती है। राजनीति में आज जो शून्यता उत्पन्न हुई है, उसे भरने का दावा ‘आम आदमी पार्टी’ कर रही है। अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में बनी आम आदमी पार्टी आम जनता की उम्मीदों पर कितना खरी उतरेगी, यह तो वक्त बतायेगा। आम आदमी की पार्टी यदि चापलूसी की बजाय आम कार्यकर्ताओं को तरजीह देगी तो उसका भविष्य उज्जवल होगा। हालांकि, जिस तरह से श्री केजरीवाल ने कहा है कि हमारी पार्टी में कोई सुप्रीमो नहीं होगा, सब लोग बराबर रहेंगे। अच्छे लोग पार्टी में जोड़े जायेंगे। आम आदमी के पैसे से पार्टी संचालित होगी।
संबंधों के साथ-साथ आजकल राजनीति में परिवारवाद ने जिस प्रकार अपना प्रभाव बढ़ाया है उससे तो यही साबित होता है कि एकाध जगह छोड़कर अन्य दलों में परिवार के लोग ही प्रमुख पदों पर विराजमान रहेंगे। समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, कांग्रेस साहित तमाम प्रमुख दलों में कमोवेश यही देखने को मिलता है। बसपा में तो मायावती का एक छत्रा राज कायम है। भारतीय जनता पार्टी के बारे में कहा जाता है कि वहां एक अदना सा व्यक्ति किसी भी बड़े पद पर पहुंच सकता है, मगर व्यावहारिक धरातल पर अब वहां भी बहुत मुश्किल होता जा रहा है।