आशीर्वाद और अभिशाप दो ऐसे शब्द हैं जिनसे मानव उत्थान का होना न होना निर्धारित होता है। कहने का आशय यह है कि आशीर्वाद एवं शुभकामनाओं से सकारात्मक तरंगों का प्रसार होता है, जबकि अभिशाप या यूं कहें कि बद्दुवाओं से नकारात्मक तरंगों का प्रसार होता है। सही मायनों में देखा जाये तो पूरा विश्व ही लहरों एवं तरंगों के आधार पर चलायमान है। जिस समय भारत पूरे विश्व का नेतृत्व करता था और उसे विश्व गुरु कहा जाता था। वही काल भारत के लिए सर्वोत्तम माना गया है।
इसी स्वर्णिम काल के कुछ वर्ष पहले भगवान महावीर ने भारत के साथ पूरे विश्व को ‘अहिंसा परमो धर्मः’ का संदेश पुनः जैन धर्मानुसार दिया था। इस संदेश को भारतीय सभ्यता-संस्कृति में जीवन का मूल मंत्रा माना गया है। राष्ट्र एवं समाज इसी भूल मंत्रा के आधार पर क्रियाशील रहा है। इस दौर में न तो किसी नशीली वस्तु का सेवन होता था और न ही मूक एवं लाचार जानवरों की हत्याएं होती थीं, जिसके कारण सकारात्मक तरंगें आध्यात्मिक तरंगों के साथ मिलकर भारत को परम वैभव के मार्ग पर ले जाने का काम करती थीं।
जिस समय भारत सोने की चिड़िया कहलाकर विश्व गुरु की भूमिका अदा कर रहा था, उस समय अहिंसक समाज का वर्चस्व बरकरार रहा था और आज भी अगर देशभर में अहिंसक समाज के लोगों की हैसियत को देखा जाये तो कहा जा सकता है कि यह समाज एक सशक्त धनाढ्य समाज है जो ईमानदार और सात्विक भी है। यह भी कहावत एक प्रचलन में है कि आज भारत अपनी संस्कृति, सभ्यता की प्राचीनता को अगर बचाये हुए है तो इसका कारण देश में संत-महात्माओं, त्यागी-तपस्वियों, ऋषि-मुनियों की अदृश्य तपोबल की शक्तियों के कारण ही है।
विज्ञान भी इस बात को मानता है कि जिन क्षेत्रों में कत्लखाने अधिक होते हैं वहां भूकंप आने की संभावना अधिक रहती है। किसी भी जरूरतमंद की मदद करने पर उसके मुख से जो दुआ निकलती है, उसे वेदों, पुराणों एवं शास्त्रों में बहुत बड़ा पुण्य माना गया है इसीलिए जगह-जगह यह बात जानने, सुनने एवं देखने को मिलती रहती है कि ‘नर सेवा ही नारायण सेवा है’ यानी किसी जरूरतमंद की सेवा नारायण यानी भगवान विष्णु की सेवा करने के समान है। इससे यह आसानी से समझा जा सकता है कि किसी लाचार एवं मजबूर की सेवा के क्या मायने एवं महत्व है। भारतीय सभ्यता-संस्कृति में एक महत्वपूर्ण बात यह भी कही गई है कि किसी की मदद कर उसका ढिंढोरा भी नहीं पीटना चाहिए यानी कि बेवजह उसका प्रचार-प्रसार नहीं करना चाहिए। इस संदर्भ में अपने समाज में एक प्राचीन कहावत प्रचलित है कि ‘नेकी कर दरिया में डाल’ यानी किसी की मदद करके उसे भूल जाना चाहिए। इस बात की उम्मीद बिल्कुल भी नहीं करनी चाहिए कि जिस व्यक्ति की मदद की गई है, वह उससे मदद के बदले किसी तरह का एहसान जताये। संभवतः इन्हीं बातों को ध्यान में रखकर भारतीय समाज में ‘गुप्त दान को सबसे उत्तम दान’ माना गया है और एक हाथ से किया गया दान दूसरे हाथ को भी ज्ञात नहीं होना चाहिए तभी उस दान की सार्थकता का महत्व होता है।
हालांकि, आजकल देखने में आ रहा है कि गुप्त दान की परंपरा लुप्त होती जा रही है। अधिकांश लोगों की यह इच्छा रहती है वे जो कुछ भी दान दे रहे हैं, उसका खूब प्रचार-प्रसार हो और उन्हें समाज में दान करते हुए देखा जाये। सामान्य भाषा में यदि इसका विश्लेषण किया जाये तो कहा जा सकता है कि ‘गाने वालों से ज्यादा बजाने वालों की जरूरत है’ यानी यदि कुछ किया जाये तो उसका प्रचार-प्रसार करने वाले भी चाहिए
वैसे भी, देखा जाये तो वर्तमान दौर में अधिकांश मामलों में दान एवं मदद के एवज में प्रचार-प्रसार का कार्य और अधिक जोर पकड़ता जा रहा है। वैसे, हमारी प्राचीन सभ्यता-संस्कृति में जो भी बातें बताई एवं कही गई हैं, वे एकदम अकाट्य एवं उनका वैज्ञानिक महत्व भी है।
हकीकत यह है कि विज्ञान अपनी तरफ से नया कुछ भी नहीं कर पा रहा है बल्कि हमारे ऋषियों-मुनियों, साधु-संतों, विद्वानों, मनीषियों, वेद-पुराणों एवं अन्य धार्मिक ग्रंथों में जो कुछ भी लिखा एवं बता दिया गया है, विज्ञान उसी के इर्द-गिर्द घूम रहा है या यूं कहें कि उन्हीं सब पर रिसर्च कर रहा है। हमारी संस्कृति में एक बात यह भी बताई गई है कि जहां-जहां मूक जानवरों की हत्या अधिक होती है, वहां शराब का सेवन भी अधिक होता है और नकारात्मक तरंगों के द्वारा राक्षसी वातावरण का निर्माण होता रहता है। यह बात अपने आप में पूरी तरह सत्य है कि ऐसा नकारात्मक वातावरण हर दृष्टि से घातक साबित होता है। बात सिर्फ यहीं एक सीमित नहीं है अपितु शराब के अत्यधिक सेवन के कारण ही परिवारों में नकारात्मक ऊर्जा अशांति के रूप में प्रकट होती रहती है। वैसे भी देखा जाये तो आज भारत सहित पूरी दुनिया में शराब का सेवन अधिक हो रहा है। शराब एवं मांस मानव जीवन में जहां दोनों इकट्ठा हो जायें वहाँ क्या होगा, इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। शराब के नशे में कैसे-कैसे उत्पात एवं उपद्रव देखने को मिल रहे हैं। इससे राष्ट्र एवं समाज पूरी तरह अवगत है। भारतीय समाज में बड़े-बुजुर्ग कहा करते थे कि यदि किसी का घर-परिवार बर्बाद करना है तो पहले उस परिवार के बच्चों एवं अन्य सदस्यों को अपने पैसे से शराब पिलाने की आदत डाल दी जाये, जब उस घर के बच्चे एवं अन्य सदस्य पूर्ण रूप से शराब के आदी हो जायेंगे तो उस घर को बरबाद होने से कोई रोक नहीं सकता है। किसी भी घर-परिवार में जिस दिन ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है उसी दिन से किसी न किसी रूप में हिंसा की शुरुआत होती है। चाहे वह घर-परिवार में मारपीट के रूप में, शारीरिक शोषण के रूप में या चोरी-डकैती के रूप में या फिर किसी अन्य रूप में हो यानी चारों तरफ बरबादी का आलम।
जिस समय भारत विश्व गुरु रहा है, उस कालखंड की बात की जाये तो लोग उस समय भगवान महावीर के दो बड़े संदेशों ‘अहिंसा परमो धर्मः एवं ‘जियो और जीने दो’ पर पूरी तरह अमल करते थे। इन संदेशों से प्रेरित होकर लोगों ने राष्ट्र एवं समाज निर्माण में अपना पूर्ण रूप से योगदान दिया। यही वह कालखंड था जब अपने देश में पुण्य आत्माओं की संख्या काफी अधिक थी और उनकी कृपा राष्ट्र एवं समाज को भरपूर मिल रही थी। वह कालखंड चाहे भगवान महावीर का रहा हो, गौतम बुद्ध का रहा हो, सम्राट विक्रमादित्य का रहा हो या फिर किसी अन्य का। आज आवश्यकता इस बात की है कि वैसी ही पुण्य आत्माओं का अवतरण पुनः हो, जिससे देश फिर से विश्व गुरु बनने के मार्ग पर अग्रसर हो सके।
यह बात पूरी तरह सत्य है कि ऐसी पुण्य आत्माओं का अवतरण बिना ईश्वरीय कृपा के संभव नहीं है। इतना निश्चित है कि जब ऐसी पुण्य आत्माओं का अवतरण होगा या संख्या अधिक होगी, तब देश को एक नयी दिशा मिलनी शुरू हो जायेगी।
हमारे देश के ऋषियों-मुनियों एवं संत-महात्माओं ने जितने भी धार्मिक स्थल बनाये हैं, यदि उनसे जरा भी छेड़छाड़ होती है तो उसके भयावह परिणाम देखने को मिल जाते हैं। चाहे वह भगवान केदारनाथ की भीषण त्रासदी हो या अन्य कोई और आपदा इसलिए पूज्य संतों के द्वारा इस बात के लिए हमेशा आगाह किया जाता रहा है कि देश में जितने भी सिद्धपीठ, शक्तिपीठ, ज्योतिर्लिंग एवं अन्य पूजा स्थल हैं, उनसे कोई छेड़छाड़ न की जाये। यदि छेड़छाड़ होगी तो उसके दुष्परिणाम झेलने के लिए लोगों को सदैव तत्पर रहना चाहिए। जिस दिन पूरी तरह लोग ऐसी मर्यादा का पालन करना शुरु कर देंगे, निश्चित रूप से पुण्य आत्माओं का धरती पर आना एवं उनकी कृपा प्रारंभ हो जायेगी। शायद, इसीलिए धार्मिक स्थलों को पर्यटन स्थलों में बदलने की पहल पर बहस छिड़ी हुई है कि क्या इन आध्यात्मिक स्थलों की पवित्राता पर्यटन स्थल बनने के बाद सुरक्षित रह सकेगी या नहीं?
आज पूरा विश्व पाश्चात्य जगत की चकाचैंध से प्रभावित हो रहा है और उसका व्यापक असर भारत में भी दिखाई दे रहा है। पाश्चात्म जगत की चकाचैंध में फंसने एवं उलझने के कारण भारतीय सभ्यता-संस्कृति एवं आध्यात्मिक विरासत को काफी नुकसान भी पहुंचा है और यह भारत के लिए आत्मघाती भी साबित हो रहा है। यदि इस आत्मघाती स्थिति से बचना है तो फिर से भारतीयों को प्रकृति की शरण में आना ही होगा और प्रकृति के नियमों-सिद्धांतों के अनुरूप जीवन जीना होगा यानी प्रकृति से उतना ही लेना होगा, जितना जीवन के लिए जरूरी है। चूंकि, प्रकृति का सिद्धांत पूरी तरह ‘अहिंसा परमो धर्मः’ एवं ‘जियो और जीने दो’ पर आधारित है। अतः यह रास्ता मानव समाज को हिंसा से दूर ले जायेगा, चाहे वह किसी भी प्रकार की हिंसा हो।
आज देश में बहुत ही व्यापक स्तर पर ‘गोवंश’ एवं ‘मूक जानवरों’ की हत्याएं हो रही हैं, जिनकी चीख-पुकार, मदद की गुहार एवं चीत्कार वायुमंडल में विलीन हो जाती है किन्तु उस पीड़ा एवं वेदना का कहीं न कहीं समावेश तो होता ही है। जैसे पाप एवं पुण्य का ऊपर वाले के दरबार में लेखा-जोखा होता है वैसे ही इन मूक जीवों की वेदना-पीड़ा का भी लेखा-जोखा होता है, आज नहीं तो कल इसका हिसाब चुकाना ही होगा।
चूंकि, प्रकृति के किसी भी जीव में चाहे वे पेड़-पौधे, वनस्पति, जलचर, वायुचर छोटे से छोटा एवं बड़े से बड़ा जीव हो, सभी में एक ही जैसी आत्मा होती है। यदि किसी को नष्ट किया जायेगा एवं कष्ट पहुंचाया जायेगा तो उसे पीड़ा होगी ही। जीवों की यही वेदना मानव समाज पर किसी दिन कहर बन कर आती है जिससे मानव ‘त्राहिमाम-त्राहिमाम’ करने लगता है और फिर प्रकृति की शरण में जाकर रोने एवं गिड़गिड़ाने लगता है। वैसे, प्रकृति काफी हद तक माफ भी कर देती है किन्तु जब हद हो जाती है तो थोड़ा झटका दे देती है। इस छोटे से झटके से ही सृष्टि के सबसे बुद्धिमान प्राणी मानव को घुटने के बल लेटने के लिए मजबूर हो जाना पड़ता है इसलिए पहले से ही सावधान रहना जरूरी है।
भारतीय सभ्यता-संस्कृति में जानवरों, एवं अन्य जीवों की हत्या की बात तो किसी रूप में भी क्षम्य नहीं है बल्कि कदम-कदम पर उनके पोषण की परंपरा है। भारतीय समाज में अनादि काल से यह परंपरा विद्यमान है कि पहली रोटी गाय को एवं अंतिम रोटी कुत्ते को दी जानी चाहिए।
सृष्टि के जहरीले जीव सांपों को नागपंचमी के दिन दूध पिलाया जाता है। इसका सीधा सा अभिप्राय यह है कि जहरीले जीवों का भी पोषण होना चाहिए। चींटी जैसे छोटे जीव को आटा खिलाने एवं चिड़ियों को दाना डालने की परंपरा हमारे समाज में अनादि काल से विद्यमान है। भू-माफिया आज नदियों के किनारे जमीन कब्जा करने में लगे हैं, जबकि उन नदियों को बेटी, बहन एवं मां के समान मानकर भारतीय संस्कृति में उनकी पूजा की जाती रही है। जिन पर्वतों को तोड़ कर विकास की गाथा लिखी जा रही है, उन्हें हमारी संस्कृति में देव माना गया है इसलिए हमारे ऋषि-मुनि पहाड़ों पर तप के लिए जाते रहे हैं। शायद, इसीलिए सृष्टि रचयिता शिवजी ने भी अर्धनारीश्वर के रूप में प्रकट होकर नारी की शक्ति, पूजनीय स्तर व उसकी अनिवार्यता को साक्षात गं्रथों के माध्यम से परिलक्षित किया है।
कहने का आशय यह है कि प्राचीन जीवन पद्धति एवं संस्कृति में प्रत्येक जीव-जन्तु एवं प्राणी के पोषण की परंपरा रही है, किन्तु मानव समाज अपने को सबसे बुद्धिमान एवं शक्तिशाली समझ कर सभी परंपराओं की अवहेलना में लगा है। प्रकृति के समक्ष मानव एवं विज्ञान की क्या औकात है, वह कोरानो काल में पूरी दुनिया
देख चुकी है। प्रकृति के किसी भी नियम-सिद्धांत की अवहेलना होती है तो वह रास्ता निश्चित रूप से हिंसा से ही होकर जाता है। भारत सहित पूरी दुनिया में शराब का प्रचलन फैशन के तौर पर चल पड़ा है, जबकि हमारे संत-महात्मा कहते रहे हैं कि यदि किसी भी व्यक्ति को किसी तरीके से शराबमुक्त कर दिया जाये तो उससे बहुत पुण्य मिलता है और किसी भी शराबी के शराब मुक्त हो जाने से उसके घर-परिवार की बर्बादी बच जाती है।
सही मायनों में ऐसे कर्मों को ही ‘अहिंसा’ के रूप में माना जाता है। ‘दुआ’ और ‘बद्दुआ’ की हमारी संस्कृति में कितनी मान्यता है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब कोई व्यक्ति बीमार होता है या किसी भीषण संकट में फंसता है तो उसे दवा के साथ-साथ दुवाओं की भी सलाह दी जाती है।
अमूमन प्रत्येक भारतीय परिवार में बच्चों को बताया जाता है कि सुबह उठकर धरती माता को प्रणाम करना चाहिए, सूर्य भगवान का दर्शन करना चाहिए। जब भी-जहां भी अवसर मिले अपने मां-बाप, गुरुजनों, बड़े-बुजुर्गों का पैर छूकर आशीर्वाद लेना चाहिए। जब भी मौका मिले लाचार एवं मजबूर की मदद करनी चाहिए। यह सब बच्चों को इसलिए बताया एवं सिखाया जाता है कि उसके जीवन में किसी भी प्रकार का आभिशाप या बद्दुआ ग्रहण बनकर हावी न हो जाये। उपरोक्त बातों को ध्यान में रखकर यदि विचार किया जाये तो स्वतः स्पष्ट हो जाता है कि आज हमारे समाज में अभिशाप एवं बद्दुआ का ग्राफ आशीर्वाद एवं दुआ के मुकाबले कितना ऊंचा है? ऐसी स्थिति में त्राहिमाम एवं बेचैनी का वातावरण नहीं होगा तो और क्या होगा? जब हमारे ऋषि-मुनि जानवरों, जीव-जंतुओं, पेड़ों, नदियों, पहाड़ों, पशु-पक्षियों से संवाद करके उनके दुख-दर्द एवं हर बात को समझ जाते थे तो क्या हमें उस रास्ते पर चलने एवं उस विद्या को जानने का प्रयास नहीं करना चाहिए?
वर्तमान समय की बात की जाये तो आज भी कहा जाता है कि यदि किसी पेड़ के पास से बार-बार गुजरा जाये तो पेड़ भी व्यक्ति को पहचानने लगता है। यही तो है ‘जियो और जीने दो’ का सिद्वांत। कुल मिलाकर कहने का आशय यही है कि हिंसक कमाई का रास्ता त्याग अहिंसा का मार्ग अपनाकर ही अपनी दाल-रोटी की व्यवस्था करनी चाहिए। वैसे भी कहा जाता है कि ‘जैसा खाओगे अन्न-वैसा होगा मन’ या ‘जैसा करोगे, वैसा भरोगे।’ मानव किसी की आंख में भले ही धूल झोंक दे किन्तु ऊपर वाले की नजर से बच नहीं सकता है। हिंसक रास्ता अपनाने से सिर्फ हाय ही मिलती है। किसी भी हाय का हिसाब ऊपर वाला कैसे करता है, यह सभी को मालूम है, तभी तो लोग कहते हैं कि ऊपर वाले की लाठी में आवाज तो नहीं होती, किंतु लगती बहुत तेज है।
इसलिए इस देश को विश्व गुरुत्व पुनः प्राप्त करने के लिए मानव अस्तित्व को पवित्रा और पुण्य आत्माओं की संख्या बढ़ाने की तरफ अग्रसर होकर विशेष साहसिक व ऐतिहसिक कदम उठाकर संपूर्ण शराबबंदी व जीव हत्या रोकने जैसे कानून बनाने होंगे। इस कार्य में समय लगेगा मगर आने वाली पीढ़ियां न केवल सुधर जायेंगी बल्कि इस दिशा में बढ़ते कदम स्वर्णाक्षरों में अंकित होकर पहल और नेतृत्व करने वाले के नाम को अमरत्व प्रदान करने की दिशा में सहायक होंगी, ऐसा मुझे पूर्ण विश्वास है।
यह बात भी शाश्वत सत्य है कि नेक, सात्विक व ईमानदारी से कमाया हुआ धन अगर परिवार, समाज या देश की परवरिश में लाया जाये तो उसके परिणाम भी आशानुकूल अच्छे ही होते हैं जबकि बेईमानी, शोषण, भ्रष्टाचार या अन्य किसी गैर पारंपरिक तरीके से अर्जित किया हुआ धन जब उपयोग में लाया जाता है तो ऐसा धन परिवार, समाज या देश का नुकसान करता है। और तो और, वह अपने साथ सात्विक धन को चाहे बीमारी से, बड़े नुकसान से, प्राकृतिक आपदा से, लड़ाई-झगड़ों से या परिवार में सदस्यों के चाल-चलन खराब होने के माध्यम से बरबाद हो जाता है।
कुल मिलाकर कहने का आशय यही है कि यदि ऊपर वाले की लाठी से बचना और पुनः विश्व गुरु बनना है तो ‘अहिंसा परमो धर्मः’ का मार्ग अपनाना ही होगा। इसके अलावा अन्य कोई विकल्प भी नहीं है। प्रकृति प्रेम एवं ‘जियो और जीने दो’ का सिद्धांत अपना कर भारत को विश्व गुरु बनाकर स्वयं का भी कल्याण करें एवं पूरे विश्व का भी मार्गदर्शन करें।
- अरूण कुमार जैन