वर्तमान समय सोशल मीडिया का है, इसके बिना कुछ भी करने का विचार असंभव-सा लगता है। इसमें कोई दो राय नहीं कि अपनी बातों को कम समय एवं कम पैसे में आम लोगों तक पहुंचाने का सोशल मीडिया बहुत ही सशक्त माध्यम है। प्रिंट एवं इलेक्ट्रानिक मीडिया के माध्यम से जो लोग अपनी बातों को लोगों तंक नहीं पहुंचा पाते थे, अब उनका काम सोशल मीडिया ने आसान कर दिया है। वैसे भी देखा जाये तो प्रिंट एवं इलेक्ट्रानिक मीडिया में अपने प्रचार-प्रसार का अवसर सभी को नहीं मिल पाता है। यदि मिलता भी है तो वह काफी महंगा होता है।
इसमें कोई दो राय नहीं कि सोशल मीडिया के लाभ बहुत हैं और वर्तमान समय में वह राष्ट्र एवं समाज के लिए काफी लाभकारी साबित भी हो रहा है किंतु लाभों के अनुपात में यदि हानियों की बात की जाये तो वे भी कम नहीं हैं। दुनियाभर में लगभग 200 सोशल नेटवर्किंग साइटें हैं जिनमें फेसबुक, ट्वीटर, व्वाट्सऐप, माई स्पेस, लिंक्डइन, फ्लिकर, इंस्टाग्राम (फोटो, वीडिया शेयरिंग साइट) सबसे अधिक लोकप्रिय हैं। एक सर्वेक्षण के मुताबिक दुनियाभर में करीब 1 अरब 28 करोड़ फेसबुक प्रयोक्ता हैं वहीं इंस्टाग्राम के 15 करोड़, लिक्डइन के 20 करोड़, माई स्पेस के 3 करोड़ और ट्वीटर के 9 करोड़ प्रयोक्ता हैं। इस प्रकार देखा जाये तो सोशल मीडिया के क्षेत्रा में फेसबुक सबसे आगे है।
सोशल नेटवर्किंग साइटें युवाओं की जिंदगी का अहम अंग बन गई हैं। सही मायने मे देखा जाये तो आज का दौर युवा शक्ति का है। युवा सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी बात सशक्त तरीके से देश और दुनिया के हर कोने तक पहुंचा सकते हैं। भारत की यदि बात की जाये तो कहा जा सकता है कि भारत युवाओं का देश है। यहां की आबादी में लगभग 65 प्रतिशत युवा हैं। एक अनुमान के मुताबिक भारत की सवा अरब जनसंख्या में लगभग 70 करोड़ लोगों के पास फोन है, इनमें से 25 करोड़ लोगों की जेब में स्मार्ट फोन है। 15.5 करोड़ लोग हर महीने फेसबुक पर आते हैं और 16 करोड़ लोग हर महीने व्वाट्सऐप पर रहते हैं।
भारत में 2014 के लोकसभा चुनावों के बाद सोशल मीडिया का दायरा और अधिक व्यापक हो गया है। कहते हैं कि प्रधानमंत्राी मोदी की जीत में सोशल मीडिया की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रही है। ‘सेल्फी विद डाटर’ अभियान बहुत प्रसिद्ध हुआ। इसके लिए प्रधानमंत्राी नरेंद्र मोदी ने पूरे देशवासियों को प्रेरित किया। सोशल मीडिया का प्रभाव एवं लाभ चाहे जितना भी हो किंतु उसके दुष्प्रभावों को भी कम करके नहीं आंका जा सकता है। सोशल मीडिया के अत्यधिक उपयोग के कारण परिवारों के टूटने की संख्या बहुत तेजी से बढ़ी है। महिलाएं सोशल मीडिया पर व्यस्त होने के कारण अपने बच्चों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दे पा रहीं हैं।
सोशल मीडिया में अत्यधिक रुचि लेने के कारण पति-पत्नी में दूनियां एवं तनाव बढ़ रहा है। पति सोशल मीडिया पर व्यस्त है तो पत्नी भी सोशल मीडिया पर व्यस्त है। ऐसे में बच्चों के पास भी सोशल मीडिया पर व्यस्त होने के अलावा दूसरा कोई रास्ता नहीं बचता है।
आये दिन अखबारों एवं मीडिया में पढ़ने, सुनने एवं देखने को मिल रहा है कि ब्लू व्हेल गेम के साइड इफेक्ट बच्चों पर हावी हो रहे हैं। इस गेम के कारण कई बच्चों ने आत्महत्या भी की है। बच्चों में इस गेम के कारण इस कदर भय व्याप्त हो जाता है कि उनके समक्ष आत्महत्या करने के अतिरिक्त दूसरा कोई विकल्प ही नहीं बचता है। समय की कमी के कारण मां-बाप एवं अभिभावक बच्चों को यू-ट्यूब एवं अन्य साइटों पर कार्टून एवं अन्य खेल देखने एवं खेलने के लिए प्रेरित करते रहते हैं। इससे उन्हें लगता है कि बच्चे उन्हें परेशान नहीं करेंगे, किंतु ऐसे मां-बाप एवं अभिभावकों को यह नहीं पता कि उनका बच्चा किस तरफ बढ़ रहा है।
सोशल मीडिया पर अधिक व्यस्त होने के कारण बच्चों का मानसिक विकास तो हो जाता है किंतु उसका शारीरिक विकास अवरुद्ध हो जाता है। सभ्यता, संस्कृति एवं संस्कार के मामले में बच्चा जीरो हो जाता है। जाहिर-सी बात है कि जब अभिभावकों के पास बच्चों के लिए समय ही नहीं है तो बच्चों में सभ्यता, संस्कृति एवं संस्कार के अंकुर कहां से फूटेंगे? ऐसे में बच्चे स्व यानी अपने आप में लीन हो जाते हैं। एकाकीपन उनके जीवन का हिस्सा बन जाता है।
कभी-कभी देखने में आता है कि राजनीतिक दल एवं कार्यकर्ता अपने विरोधियों के खिलाफ झूठी एवं मनगढ़ंत बातें सोशल मीडिया पर प्रचारित करते रहते हैं जबकि उनमें कोई सच्चाई नहीं होती है। अभी हाल ही में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अमित शाह ने युवाओं को आगाह करते हुए कहा कि वे सोशल मीडिया पर फैलाई जा रही अफवाहों एवं सरकार विरोधी झूठी खबरों पर ध्यान न दें। यह बात श्री अमित शाह ने गुजरात चुनाव के संदर्भ में कही है। आजकल देखने में आ रहा है कि टीवी चैनलों पर अधिकांश खबरें सोशल मीडिया से ली जा रही हैं।
सोशल मीडिया की खबरों को आधार बनाकर टीवी चैनलों पर चर्चाएं हो रही हैं। इन खबरों पर मीडियाकर्मी सिर्फ अपना दृष्टिकोण ही पेश नहीं करते हैं बल्कि अपने मन मुताबिक दूसरे लोगों को भी बोलने के लिए प्रेरित करते हैं। इसका सीधा-सा दुष्प्रभाव यह होता है कि वास्तविक खबरों से लोग वंचित रह जाते हैं और लोगों का ध्यान किसी अन्य तरफ परिवर्तित कर दिया जाता है। इसका सीधा-सा अभिप्राय है कि लोगों का ध्यान जमीनी सच्चाई की बजाय अपने अनुसार किसी भी तरफ परिवर्तित कर दिया जाये।
आजकल सोशल मीडिया में एक बात यह देखने को मिल रही है कि किसी की फोटो से छेड़छाड़ एवं तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर दूसरे रूप में पेश कर दिया जाता है। देश का प्रत्येक व्यक्ति चाहे उसे संबंधित विषय का ज्ञान हो या न किंतु वह विद्वान बनने एवं दिखने की चाह में सोशल मीडिया पर चर्चा में लग जाता है, जिससे कभी-कभी अर्थ का अनर्थ भी हो जाता है।
नकारात्मक प्रचार, दंगा भड़काने एवं अन्य ऊल-जुलूल कार्यों के लिए भी सोशल मीडिया का दुरुपयोग बहुत तेजी से होने लगा है। संबंध बनाने एवं बिगाड़ने में भी सोशल मीडिया का प्रयोग बहुत तेजी से हो रहा है। सोशल मीडिया की दोस्ती बहुत दिनों तक चल नहीं पा रही है। जब तक किसी से व्यक्तिगत संपर्क नहीं किया जाये तब तक उसके बारे में ठीक से जान पाना आसान नहीं है। यही कारण है कि सोशल मीडिया की दोस्ती में लोगों को धोखे भी बहुत मिल रहे हैं। इससे साफ-साफ संकेत मिलता है कि सोशल मीडिया के माध्यम से किया गया संपर्क रेत की दीवार बनाने जैसा है।
राजनीतिक दलों में भी आजकल इस बात की चर्चा होने लगी है कि क्या मात्रा सोशल मीडिया के दम पर मजबूत संगठन एवं आदर्श कार्यकर्ता का निर्माण किया जा सकता है तो इस संदर्भ में जो बातें सामने आती हैं उससे यही साबित होता है कि जन संपर्क एंव लोगों से मिलने-जुलने के पारंपरिक एवं पुराने तौर-तरीके ही बेहतर हैं। सोशल मीडिया को जन संपर्क के अतिरिक्त संसाधन के रूप में इस्तेमाल किया जाना चाहिए। आज यही कारण है कि राजनैतिक दलों में जमीनी एवं जुझारू कार्यकर्ताओं की बजाय हवाबाज कार्यकर्ताओं का प्रादुर्भाव बहुत तेजी से हो रहा है। राजनीतिक दलों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं ने यदि सोशल मीडिया के साथ-साथ अपने परंपरागत जन संपर्कों पर ध्यान नहीं दिया तो उन्हें इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है इसलिए अभी से सतर्क रहने की आवश्यकता है।
सोशल मीडिया ने लोगों के मन में नकारात्मक भावों का प्रचार ज्यादा किया है क्योंकि वर्तमान समय में लोगों की फितरत कुछ ऐसी ही बनती जा रही है। राजनीति एवं राजनीतिज्ञों के प्रति उपजे अविश्वास ने इस नकारात्मकता के भाव को और अधिक बढ़ाने का काम किया है। मूल्यांकन किया जाये तो देखने में आता है कि सोशल मीडिया का नशा शराब से भी अधिक घातक है, इसकी लत में कितने लोगों की जान चली गई है। सड़क पर चलते हुए लोग कान में लीड लगाकर गाना सुनते हैं और आगे-पीछे क्या हो रहा है इसका पता ही नहीं लग पाता। इसका सीधा-सा परिणाम होता है कि कोई भी वाहन टक्कर मारकर चला जाता है। कुछ लोगों को तो इसकी ऐसी लत लग गई है कि वे वाहन चलाते हुए भी सोशल मीडिया पर व्यस्त रहते हैं। इस लत के कारण कभी-कभी लोगों के असमय काल के गाल में समा जाने की भी चर्चा सुनने एवं देखने को मिलती रहती है। सेल्फी लेने के चक्कर में कोई नदी में डूब जाता है तो कोई ट्रेन के नीचे आ जाता है, इस प्रकार की घटनाएं आये दिन देखने एवं सुनने को मिलती रहती हैं।
सोशल मीडिया पर हुई दोस्ती में लोगों को धोखा बहुत मिल रहा है। तमाम लड़कियों एवं महिलाओं का जीवन बर्बाद हो रहा है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि ‘जान न पहचान, तू मेरा मेहमान’ वाली कहावत सोशल मीडिया पर खूब चरितार्थ हो रही है। सोशल मीडिया इसका जीता-जागता स्वरूप एवं सबूत है। ऐसी भी घटनाएं देखने में मिली हैं कि सोशल मीडिया पर अत्यधिक आश्रित होने के कारण बच्चे अपनी सुध-बुध भी खो देते हैं। बच्चों की याददाश्त चली जाती है, बच्चे सोचना एवं बोलना बंद कर देते हैं, इससे निजात पाने के लिए बच्चों का लंबा इलाज कराना पड़ता है।
सरकारी एवं निजी दफ्तरों में भी सोशल मीडिया के अत्यधिक उपयोग के कारण कार्य प्रभावित हो रहे हैं। इसी कारण कुछ कंपनियों ने अपने कार्यालय में वर्किंग टाइम में मोबाइल की आजादी पर रोक लगा दी है। इसका सीधा-सा अभिप्राय है कि यदि हाथ में मोबाइल नहीं होगा तो कर्मचारी मन लगाकर कार्य करेंगे।
आजकल चौराहों, व्यस्त स्थानों एवं अन्य जगहों पर देखने को मिलता है कि सुरक्षा कर्मचारी भी सोशल मीडिया पर व्यस्त रहते हैं। कभी-कभी उन्हें इस बात का पता भी नहीं चल पाता कि उनके अगल-बगल हो क्या रहा है? ऊपर से फ्री वाई-फाई मिल जाये तो मामला और भी रंगीन हो जाता है।
कुल मिलाकर कहने का आशय यही है कि आम जन-जीवन में सोशल मीडिया वरदान के रूप में है तो किंतु उसके अभिशाप भी कम नहीं हैं। अतः आवश्यकता इस बात की है कि इसके दुष्प्रभावों के प्रति लोगों को जागरूक किया जाये जिससे लोग सोशल मीडिया के दुष्प्रभावों से बच सकें एवं आने वाली पीढ़ी को सभ्यता, संस्कृति एंव संस्कारों की घूंट पिलायी जा सके। मेरा कहने का आशय यह बिल्कुल भी नहीं है कि लोग सोशल मीडिया से बिल्कुल दूर हो जायें किंतु इतना जरूर कहना चाहता हूं कि लोग सोशल मीडिया का प्रयोग उतना ही करें जितने की निहायत ही आवश्यकता है। वैसे भी एक पुरानी कहावत है कि एक सीमा से अधिक किसी भी चीज का इस्तेमाल हमेशा घातक होता है। पूरे समाज को इस संबंध में व्यापक रूप से सचेत होने एवं विचार करने की आवश्यकता है।