सामाजिक आंदोलन समय की मांग


संपादकीय नवंबर 2012

पिछले साल दिल्ली के ऐतिहासिक रामलीला मैदान में प्रसिद्ध गांधीवादी समाजसेवी अन्ना हजारे के नेतृत्व में आंदोलन हुआ तो उस समस्या से निपटने के लिए सरकार के पसीने छूट गये। अन्ना की टीम मांग तो रही थी जन लोकपाल, किंतु सरकार लोकपाल कानून बनाने का वादा करके अनशन तुड़वाने में तो कामयाब रही, मगर संसद में लोकपाल कानून नहीं बन पाया। इसके पहले काले धन को लेकर बाबा रामदेव ने उसी रामलीला मैदान में आंदोलन किया था तो सरकार ने उनके आंदोलन को तहस-नहस कर दिया। बाबा रामदेव किसी तरह अपनी जान बचाकर भागने में कामयाब रहे किंतु इस वर्ष उसी बाबा रामदेव ने आंदोलन किया तो उनका आंदोलन काफी कामयाब रहा। उन्हें इस बात का निश्चित रूप से संतोष हुआ होगा कि पिछले वर्ष रामलीला मैदान में उनका जो अपमान हुआ था, उसका कलंक धोने में बाबा कामयाब रहे। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्राी सहित कई केंद्रीय मंत्राी एवं कांग्रेस नेताओं का कहना है कि बहुत ज्यादा आंदोलनों से देश में अराजकता फैलती है। आखिर इस प्रकार की बातें कर सरकार एवं कांग्रेस पार्टी क्या दर्शाना चाहती है? क्या सरकार यही चाहती है कि वह जो कुछ कर रही है, उस पर कोई टिप्पणी न की जाये। भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई आवाज न उठाई जाये?

आज सरकार बार-बार यह दर्शाने का प्रयास कर रही है कि देश में चाहे जितने भी आंदोलन  हो जायें, किंतु उसे इन आंदोलनों की कोई परवाह नहीं है। शायद इसी कारण जिस दिन एफडीआई के खिलाफ राष्ट्रव्यापी आंदोलन हुआ, उसी दिन सरकार ने एफडीआई के लिए अधिसूचना जारी कर दी। डीजल और पेट्रोल के बढ़े दामों के खिलाफ जब कोई आंदोलन होता है तो सरकार उसके दाम और अधिक बढ़ा देने की बात कह देती है। ‘इंडिया एगेंस्ट करप्शन’ के सदस्य अरविंद केजरीवाल एवं उनकी टीम आये दिन भ्रष्टाचार के मामलों का खुलासा कर रही है तो सरकार ऐसा दिखाने का प्रयास करती है जैसे उसे इन आरोपों से कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है जबकि वास्तविकता तो यह है कि सरकार अरविंद केजरीवाल एवं उनकी टीम के प्रहारों से बहुत ही हैरान एवं परेशान है। सिर्फ वह इस बात का दिखावा करती है कि उसे इन आरोपों की कोई परवाह नहीं है।

राजनैतिक बिरादरी कुछ भी कहे एवं सोचे किंतु सच्चाई यह है कि सामाजिक आंदोलनों से उस पर बहुत व्यापक असर पड़ता है। देश की आम जनता कालेधन के बारे में कुछ भी नहीं जानती थी, किंतु अब वह सब कुछ समझने लगी है। आम देशवासियों को अब यह बात बहुत अच्छी तरह समझ में आ चुकी है कि उसकी सभी समस्याओं की जड़ में भ्रष्टाचार ही है। डीजल, पेट्रोल एवं गैस के दाम बढ़ाने के लिए सरकार कुछ भी तर्क दे, किन्तु उसके तर्कों से आम जनता को कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है। कुछ मिलाकर कहने का आशय यही है कि सरकार कहने को कुछ भी कहे, मगर आम जनता को गुमराह नहीं कर सकती। यह सब इसलिए संभव हो सका है कि सामाजिक आंदोलनों में जनता ने भारी संख्या में भागीदारी की। उसी भागीदारी एवं अन्य प्रचार माध्यमों से जनता को अब सब कुछ समझ में आने लगा है। आंकड़ों के माध्यमों से सरकार यह दिखाना चाहती है कि महंगाई कम हो रही है परंतु, वास्तविक धरातल पर उसका कोई असर नहीं हो रहा है। अतः आज आवश्यकता इस बात की है कि जनता तात्कालिक मामलों को छोड़कर दूर की सोचे। जब उसकी दूरदृष्टि तेज होगी तो सरकार भी मनमानी नहीं कर पायेगी।

वर्तमान परिवेश में सामाजिक आंदोलनों की देश को सख्त जरूरत है। इन आंदोलनों से आम जनता को एक दिशा मिलती है। सरकार इन आंदोलनों को चाहे कितना भी दबाने की चेष्टा करे, किंतु ये आंदोलन आम जनमानस पर अपनी छाप छोड़ ही जाते हैं