लाख कमियों एवं आलोचनाओं के बावजूद निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि खाकी वर्दी को देखते ही लोगों को यह विश्वास हो जाता है कि अब वे सुरक्षित हैं। यही विश्वास आम लोगों के बीच पुलिस की विश्वसनीयता को और अधिक बढ़ाता है। आम लोगों को यह भी अच्छी तरह पता है कि पुलिस को काम करने में तमाम तरह की समस्याओं एवं दबावों को झेलना पड़ता है किन्तु आये दिन कुछ ऐसी घटनाएं एवं दर्दनाक मंजर देखने-सुनने को मिलते रहते हैं जिससे यह लिखने के लिए विवश होना पड़ रहा है कि पुलिस और अधिक आम लोगों के दुख-दर्द की साथी बने।
इस दृष्टि से यदि देखा जाये तो आम जनता बड़े-बड़े गुंडों एवं माफियाओं के बजाय गली-मुहल्लों, गांवों, चैराहों एवं चैपालों के इर्द-गिर्द मौजूद लुच्चों, लफंगों, बेवड़ों एवं जेबकतरों से परेशान होती है। यदि ऐसे लोगों से परेशान कोई भी व्यक्ति पुलिस के पास जाये तो पुलिस विभाग को ऐसी शिकायतों पर तुरंत संज्ञान लेना चाहिए। गली-मुहल्ले के किसी गुंडे एवं लुच्चे से परेशान होकर कोई बालिका स्कूल जाना छोड़ दे या डर के कारण आत्महत्या कर लेती है तो ऐसी स्थिति राष्ट्र एवं समाज के लिए काफी दुखदायी एवं हृदय विदारक होती है। ऐसी नौबत किसी के समक्ष न आये, इसके लिए समाज के सभी लोगों को सतर्क एवं जागरूक रहना होगा।
पुलिस विभाग को यदि ऐसा लगता है कि रिपोर्ट न लिखने से समस्याएं समाप्त हो जायेंगी तो ऐसा कदापि नहीं होने वाला है। समस्याओं का समाधान तो उसके निराकरण से ही होगा। किसी को अपनी समस्या के समाधान के लिए सोशल मीडिया का सहारा लेना पड़े या अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़े तो यह पुलिस विभाग के लिए भी अच्छा नहीं कहा जा सकता है। राजधानी दिल्ली सहित सभी राज्यों में कभी-कभी देखने को मिलता रहता है कि सड़क छाप गुंडे पुलिस पर भी हमला कर रहे हैं। अभी हाल ही में राजधानी दिल्ली में एक गुंडे ने पुलिस अधिकारी पर चाकुओं से हमला कर दिया, उनकी अस्पताल में मृत्यु हो गयी।
मेरा कहने का आशय यह है कि लुच्चों-लफंगों एवं सड़क छाप गुंडों में यदि व्यापक रूप से पुलिस का खौफ व्याप्त हो जाये तो उनमें इतनी हिम्मत ही नहीं आयेगी कि वे पुलिस पर भी हमला करें किन्तु इसके लिए जरूरत इस बात की है कि हर छोटी-बड़ी घटना की रिपोर्ट दर्ज हो और उसकी छानबीन कर कार्रवाई की जाये। वैसे भी अपराधियों का कोई दीन-ईमान नहीं होता। अक्सर मिलने पर वे किसी को बख्शते नहीं हैं इसलिए वर्तमान परिस्थितियों में यह जरूरी हो गया है कि ऐसा वातावरण कायम किया जाये जिससे खाकी वर्दी का नाम सुनते ही अपराधियों का कलेजा फट जाये।
वैसे भी आम जनता का स्थानीय पुलिस के अलावा है कौन, जिसके सामने जाकर वह अपना दुख-दर्द व्यक्त कर सके। आज नहीं तो कल, इस रास्ते पर आना ही होगा क्योंकि इसके अलावा अन्य कोई विकल्प भी नहीं है, इसलिए अपराधियों में जितनी जल्दी खौफ का वातावरण बना दिया जाये, उतना ही अच्छा होगा।
- जगदम्बा सिंह