आज समाज ऐसे मुकाम पर खड़ा है जहां लोगों को जोड़ने के अवसर सीमित होते जा रहे हैं और तोड़ने के रास्ते नित्य-प्रतिदिन बढ़ते जा रहे हैं। जातिवाद, क्षेत्रावाद, भाषावाद, संप्रदायवाद एवं अन्य वाद लोगों पर हावी होते जा रहे हैं। इन्हीं आधार पर हिंसा की घटनाओं को लगातार अंजाम दिया जा रहा है। मानसिक शांति का आधार सीमित होता जा रहा है। जो लोग हर दृष्टि से सुखी एवं समृद्ध हैं उनमें भी हताशा एवं निराशा का भाव बढ़ रहा है। वे भी डिप्रेशन का शिकार हो रहे हैं। आखिर यह सब क्या है? जब लोग ही मानसिक रूप से शांत एवं सकारात्मक नहीं होंगे तो स्वस्थ समाज का निर्माण कैसे होगा? जब स्वस्थ समाज का निर्माण नहीं होगा तो स्वस्थ राष्ट्र का निर्माण कैसे हो सकता है? इसका सीधा-सा अभिप्राय यह है कि स्वस्थ राष्ट्र के लिए स्वस्थ मानसिकता वाले नागरिकों की नितांत आवश्यकता है।
जिस भारत में ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम्’’ की बात होती थी वहां भाषा, धर्म, जाति, क्षेत्रा एवं संप्रदाय की अलख जग रही है तो यह अपने आप में निहायत ही चिंता की बात है। ऐसे में भारत फिर से आध्यात्मिक रूप से विश्व गुरु एवं सोने की चिड़िया कैसे बन सकता है? ऐसे माहौल में तो अखंड भारत की कल्पना भी बेमानी है।
वास्तव में देखा जाये तो विभाजन की कोई सीमा ही नहीं है। उदाहरण के तौर पर पहले लोग धार्मिक आधार पर विभाजित होते हैं, फिर उसके बाद अपने-अपने धर्मों में जातियों के आधार पर विभाजित हो रहे हैं, फिर उसके बाद गोत्रों एवं उप-गोत्रों में भी विभाजित हो रहे हैं और यहीं पर ही विभाजन की सीमा नहीं रुक रही है। गोत्रों, उप-गोत्रों में विभाजित होने के बाद कुल-खानदान का विभाजन हो रहा है और कुल-खानदान के बाद परिवारों का विभाजन हो रहा है और उसके बाद पिता-पुत्रा का भी विभाजन हो रहा है। अब तो स्थिति यहां तक पहुंच चुकी है कि पति-पत्नी में भी विभाजन हो रहा है अर्थात कहने का आशय यही है कि किसी भी आधार पर विभाजन को बढ़ावा दिया जाये किंतु उसका अंत कहीं नहीं है। इसका सीधा-सा मतलब यही है कि विभाजन का आधार चाहे भाषा, क्षेत्रा, जाति, संप्रदाय या कुछ भी हो किसी भी तरह के विभाजन से समाज एवं राष्ट्र का भला होने वाला नहीं है। अतः इसे किसी भी कीमत पर हतोत्साहित करने की आवश्यकता है।
इस संबंध में जहां तक मेरा विचार है, इस विभाजन की खाई को रोकने के लिए कहीं से तो शुरुआत करनी होगी। मेरे विचार से यदि सभी नामों के आगे से यदि ‘सरनेम’ हटा दिया जाये तो भी सामाजिक एकता एवं समरसता की दिशा में बहुत बड़ी पहल हो सकती है। धर्म चाहे कोई हो, ऊंच-नीच के आधार पर जातियों का निर्माण सभी जगह हुआ है। किसी धर्म में कम है तो किसी में अधिक। इन्हीं जातियों के आधार पर लोगों के ‘सरनेम’ एवं गोत्रा भी बंटे हुऐ हैं।
पूरी दुनिया में मानव स्वभाव में एक फितरत बढ़ती जा रही है कि वह अपनी जाति, धर्म एवं अन्य बातों को सर्वोपरि मानने लगा है और इसी के आधार पर वह अन्य लोगों से पक्षपात एवं भेदभाव करता है। किसी के नाम के आगे ‘सरनेम’ लगा होने से जाने-अनजाने में लोगों का शोषण एवं तुष्टिकरण हो ही जाता है।
वर्तमान समय में देखने में आता है कि तमाम लोगों का झुकाव अपनी जाति के लोगों की तरफ होने लगा है। समाज में कुछ लोग ऐसे हैं जो धर्म जाति, भाषा, क्षेत्रा की बात नहीं करना चाहते हैं किंतु कभी-कभी परिस्थितियां ऐसी बन जाती हैं कि उन्हें भी करना पड़ता है। ऐसे में यदि किसी के नाम के आगे ‘सरनेम’ होगा ही नहीं तो यही नहीं पता चल पायेगा कि कौन किस जाति या गोत्रा का है तो पक्षपात की बात नहीं हो पायेगी। शायद यही कारण है कि दक्षिण भारत में अधिकांश मामलों मंे नाम के आगे गांव, पिता, परदादा या अन्य शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है। उदाहरण के तौर पर पूर्व राष्ट्रपति स्वः एपीजे अब्दुल कलाम एवं पूर्व प्रधानमंत्राी स्वः पी.वी नरसिंह राव सहित तमाम लोगों के नामों में कुछ ऐसा ही देखने को मिलता है। इसके पीछे शायद यही कारण होगा कि ‘सरनेम’ के आधार पर किसी को यह पता नहीं चलेगा कि कौन किस जाति का है?
राष्ट्र की एकता, अखंडता, समरसता एवं भाईचारे की भावना को और अधिक मजबूत करने के लिए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने 1925 में इसी परंपरा की शुरुआत की थी। आरएसएस के अधिकांश लोग अपने नाम के आगे ‘सरनेम’ नहीं लगाते हैं। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण यही है कि भारत में जातिविहीन समाज की स्थापना की जाये, जिससे एक स्वस्थ समाज एवं स्वस्थ राष्ट्र का निर्माण हो सके। संघ आज भी अपनी उसी परंपरा पर अमल कर रहा है। हालांकि, संघ को अभी भले ही इस कार्य में पूरी तरह सफलता नहीं मिल पाई हो किंतु सामाजिक समरसता की दिशा में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने बहुत ही बेहतरीन एवं सराहनीय कार्य किया हैै।
आज यदि समाज में जाति, भाषा, क्षेत्रा एवं संप्रदाय के आधार पर संगठनों का संचालन हो रहा है तो इससे समस्याएं बढ़ेंगी ही। अतः इसे कम करने दिशा में ऐसे कदम उठाने होंगे जिससे बच्चों में इस तरह की भावना ही न पनपे। जहां तक मेरा विचार है कि प्राइमरी स्तर से ही यदि बच्चों के नाम के आगे से ‘सरनेम’ हटा दिये जायें तो बच्चों में इस तरह की भावना ही नहीं पनपेगी। यदि बहुत आवश्यक हो तो कोई कामन ‘सरनेम’ भी तय किया जा सकता है किंतु उसकी सीमा भी तीन अक्षर से अधिक न हो। यह कार्य प्राइमरी एजूकशेन से शुरू होकर सरकारी कर्मचारियों से होते हुए राजनैतिक दलों में आना चाहिए। वैसे राजनीतिक दलों को यह कार्य स्वतः करना चाहिए। यदि नैतिक आधार पर यह कार्य न हो सके तो इसके लिए कानून भी बनाया जा सकता है अन्यथा सामाजिक विघटन की खाई और अधिक बढ़ती जायेगी।
हिन्दुस्तान की राजनीति में जातियों के आधार पर तुष्टिकरण की राजनीति खूब परवान चढ़ी है। उदाहरण के तौर पर हरियाणा की राजनीति में स्व. चौ. देवी लाल की चुनावी सफलता में ‘अजगर’ की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। ‘अजगर’ यानी अहीर, जाट, गुर्जर और राजपूत अर्थात इन चार जातियों को आधार बनाकर चौ. देवी लाल ने हरियाणा की राजनीति में एक लंबे समय तक राज किया। इसी प्रकार किसी जमाने में बसपा के संस्थापक स्व. कांशीराम ने नारा दिया था – तिलक, तराजू और तलवार, इनको जूते मारो चार यानी ब्राह्मण, वैश्य और राजपूत। श्री कांशीराम का स्पष्ट रूप से मानना था कि यदि इन जातियों का विरोध किया जायेगा तो अन्य जातियां उनके समर्थन में स्वतः आ जायेंगी। बिहार की राजनीति में राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव ने भी कुछ इसी प्रकार का नारा दिया था। उनका नारा था- भूरा बाल साफ करो यानी भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण और लाला (कायस्थ) का विरोध। हालांकि, लालू प्रसाद यादव ने अब ‘एमवाय’ समीकरण अपना लिया है ‘एमवाय’ का अभिप्राय मुस्लिम और यादव’ से है। यही समीकरण मुलायम सिंह यादव ने उत्तर प्रदेश में भी बनाया है। कहने का आशय यही है कि जातियों के आधार पर हिन्दुस्तान में राजनीति करने का एक लंबा इतिहास रहा है किंतु इससे सामाजिक समरसता बढ़ने की बजाय कम ही हुई है। हां, एक बात जरूर हुई है कि जातियों के नाम पर तमाम नेताओं का उदय अवश्य हुआ है किंतु धीरे-धीरे देखने में आ रहा है कि हिन्दुस्तान की जनता इस तरह की राजनीति को नकार रही है। श्री लालू प्रसाद यादव, सुश्री मायावती, श्री मुलायम सिंह यादव एवं अन्य लोग जो इस प्रकार की राजनीति करते थे, धीरे-धीरे उनकी लोकप्रियता एवं स्वीकार्यता कम हो रही है।
धार्मिक आधार पर भी देखा जाये तो यह व्यवस्था लोगों को रास नहीं आयी है। यदि धार्मिक आधार पर भी सब कुछ ठीक-ठाक होता तो पाकिस्तान, बांग्लादेश, ईराक, सीरिया, सूडान, मिश्र, अफगानिस्तान जैसे मुस्लिम देशों में शांति होती क्योंकि वहां एक ही धर्म का बोलबाला है किंतु वहां भी जातियों का विभाजन साफ तौर पर दिखता है। चाहे वह किसी भी रूप में हो। वहां पर भी किसी न किसी रूप में कुल खानदान या अन्य रूपों में वर्चस्व की लड़ाई है। आखिर पूरी दुनिया में यदि शिया-सुन्नी की बात चल रही है तो कहीं न कहीं से एक ही धर्म के लोगों में अलग-अलग मुद्दों को आधार बनाकर वर्चस्व की लड़ाई चल रही है।
कुछ इसी प्रकार की स्थिति प्रत्येक धर्म में देखने को मिलती है। ईसाई एवं अन्य धर्मों में भी इस प्रकार की बातें देखने को मिलती हैं। आखिर यह सब क्या है? यदि इन सब बातों का गंभीरता से विश्लेषण किया जाये तो इसके मूल में ‘सरनेम’ ही मिलेगा। चाहे उसका स्वरूप कुछ भी हो।
अतः आज आवश्यकता इस बात की है कि ‘सरनेम’ से जितनी जल्दी निजात पा ली जाये, उतना ही अच्छा होगा। किसी ‘सरनेम’ एवं अन्य वाद के बजाय किसी का तुष्टिकरण इंसानियत एवं मानवता के आधार पर होना चाहिए यानी किसी भी रूप में यदि किसी की मदद या तुष्टिकरण किया जाये तो उसका आधार मानवता एवं इंसानियत ही होना चाहिए यानी हमें ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की तरफ वापस आना ही होगा। यदि हम पूरी दुनिया को अपना परिवार मानेंगे तो इस प्रकार की भावना और अधिक बलवती होगी।
वैसे, यह बात मैं भारत के संदर्भ में कर रहा हूं किंतु मुझे लगता है कि देर-सवेर पूरी दुनिया को इसी विचारधारा की जरूरत पडे़गी अन्यथा लोग हिंसक मानसिकता का शिकार होते जायेंगे जैसा कि आज अमेरिका में भी देखने को मिल रहा है, जहां सब कुछ होते हुए भी अमेरिकी किसी ठोस सभ्यता, संस्कृति एवं स्थायी धर्म-अध्यात्म की तलाश में पूरी दुनिया में भटक रहे हैं।