विधानसभा चुनावों में  मतदान बढ़ने का आशय!


संपादकीय फरवरी 2012

पंजाब, उत्तराखंड एवं मणिपुर के विधानसभा चुनावों में मतदान का प्रतिशत जिस प्रकार अप्रत्याशित रूप से बढ़ा है, उसके तमाम तरह के अर्थ निकाले जा रहे हैं। पहले के चुनावों में आम तौर पर यही माना जाता था कि यदि मतदान अधिक होता था तो उसका आशय यही लगाया जाता था कि बढ़ा हुआ मतदान सत्ता के विरोध में हुआ है, मगर इस बार के चुनावों में मतदान बढ़ने से तमाम तरह के अर्थ लगाये जा रहे हैं। इस बार मतदान बढ़ने से जितना खुश विपक्ष हो रहा है, उससे ज्यादा सत्ता पक्ष हो रहा है। सत्ता पक्ष को लगता है कि बढ़ा हुआ वोट उसे दुबारा समर्थन के तौर पर मिला है, जबकि विपक्ष को लगता है कि बढ़ा हुआ मतदान सत्ता विरोधी लहर के कारण हुआ है। गौर तलब है कि अभी हाल में सम्पन्न हुए विधानसभा चुनावों में पंजाब में 77 प्रतिशत, उत्तराखंड में 70 फीसदी और मणिपुर में 82 फीसदी से अधिक मतदान हुआ है, जो अपने आप में एक रिकाॅर्ड है।

लोकतंत्रा की सेहत के लिए यह बहुत अच्छी बात है कि मतदान अधिक से अधिक हो। आम तौर पर अब तक यही माना जाता रहा है कि पढ़ा-लिखा एवं मध्यम वर्ग मतदान कम करता है। उसके बारे में यही धारणा है कि वह मतदान करने से अच्छा घर में आराम करना समझता है लेकिन यह एक बहुत अच्छी बात है कि यदि समाज के सभी लोग अपने घरों से निकलेंगे तो उसका व्यापक असर देखने को मिल सकता है।

आज यदि मतदान का प्रतिशत बेतहाशा बढ़ा है, तो उसमें चुनाव आयोग की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है। पहली बार ऐसा हुआ है कि बड़े पैमाने पर चुनाव आयोग ने हर राज्य में चुनाव पूर्व सर्वे कर वोटरों का मिजाज जानने की कोशिश की है। सर्वे के आधार पर जागरूकता कार्यक्रम की नीति बनाई गई है। सभी वोटरों को घरों तक फोटो पहचान-पत्रा चुनाव पूर्व उपलब्ध कराने की कोशिश की गई। बड़े पैमाने पर कैम्पेन का सहारा लिया गया। यह बता पाने में कामयाबी मिली कि किसी का एक वोट कितना मायने रखता है? युवा वोटरों पर ज्यादा जोर दिया गया। पहले का इतिहास था कि सबसे उदासीन युवा वोटर ही थे।

दरअसल, पिछले कुछ वर्षों से मतदाताओं को मतदान केन्द्रों तक ले जाने के लिए बहुत व्यापक स्तर पर प्रयास किये जा रहे हैं। इन प्रयासों का असर बिहार विधानसभा चुनाव में बहुत व्यापक स्तर पर देखने को मिला था। बिहार विधानसभा चुनाव में महिलाओं ने रिकाॅर्ड मतदान किया था। फिर प. बंगाल और तमिलनाडु में 80 प्रतिशत वोट पड़े। चुनाव आयोग के अधिकारी कहते हैं कि ऐसी स्थिति चुनाव आयोग और देश दोनों के लिए बहुत सुखद है। बिहार विधानसभा के विगत चुनाव में मुख्यमंत्राी नीतीश कुमार ने महिलाओं से अपील की थी कि घरों से निकलें एवं बिहार के बेहतर भविष्य के लिए मतदान करें। कहना न होगा कि आज उसका पूरे बिहार में देखने को मिल रहा है। बिहार की जनता ने पूरे देश को यह सोचने के लिए मजबूर किया है कि विकास के नाम पर चुनाव लड़े और जीते जा सकते हैं।

कुछ लोगों की राय है कि भारत देश में मतदान अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए, क्योंकि जब तक देश का हर तबका वोट नहीं देगा, तब तक देश के मिजाज का पता नहीं चलेगा। अभी तक तो धारणा यह बनी हुई है कि मतदान के दिन कुछ खास तबके के ही लोग मतदान करने जाते हैं, इसीलिए उन्हें ही तरह-तरह के प्रलोभन देकर रिझाने का प्रयास किया जाता है। झुग्गी वालों एवं गरीब बस्ती के लोगों के बारे में यह भ्रम फैलाने की कोशिश की जाती है कि ऐसे लोगों को थोड़ा-बहुत लालच देकर अपने पक्ष में किया जा सकता है। मगर जब हर वर्ग, समाज, धर्म के लोग वोट देने निकलने लगेंगे तो कोई भी राजनीतिक दल एवं प्रत्याशी कितने लोगों को खरीदने का प्रयास करेगा। कुल मिलाकर आज स्थिति जो बनी है, वह स्वस्थ समाज एवं समृद्ध भारत के निर्माण में बहुत कारगर साबित होगी। बशर्ते मतदान का प्रतिशत यूं ही बढ़ता रहे।