क्या लोग घोटालों की गिनती बंद कर दें?


संपादकीय सितम्बर 2012

आज देश जिस प्रकार भ्रष्टाचार के दलदल में धंसता जा रहा है, ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि क्या देशवासी अब घोटालों की गिनती करना बंद कर दें? बात भी सही है कि आखिर कितने घोटालों को याद रखा जाये। यदि सरकार का रवैया यही रहा तो देश में घोटालों की रफ्तार कम होने वाली नहीं है। सरकार और उसका पूरा तंत्रा ऐसा बर्ताव कर रहा है, जैसे ‘चोरी ऊपर से सीना जोरी’। आज सबसे महत्वपूर्ण बात यह देखने में मिल रही है कि लोग बड़े-बड़े घोटालों के चक्कर में छोटे-छोटे घोटालों को भूलते जा रहे हैं। आज देश में निर्विवाद रूप से यह मान लिया गया है कि सभी समस्याओं की जड़ भ्रष्टाचार ही है। भ्रष्टाचार देश से यदि थोड़ा-बहुत कम हो जाये तो भी देश का काफी कल्याण हो सकता है। निचले स्तर के घोटालों से आम आदमी परेशान होती है और बड़े घोटालों से राष्ट्र खोखला होता है। हर परिस्थिति में सारा भार आम आदमी पर लादा जाता हैै। इसी कारण महंगाई बढ़ती है। ताज्जुब की बात तो यह है कि इन सबके बावजूद सरकार को कहीं से यह एहसास नहीं होता कि कहीं कुछ गलत हो रहा है?

प्रधानमंत्राी डाॅ. मनमोहन सिंह के समक्ष पता नहीं क्या मजबूरी है कि वे कुछ कर ही नहीं पा रहे हैं। अभी तक तो यही कहा जा रहा था कि सरकार में तमाम लोग भले ही बेईमान एवं भ्रष्ट हैं, मगर प्रधानमंत्राी व्यक्तिगत रूप से काफी ईमानदार एवं भले व्यक्ति हैं।

मगर इस छवि के साथ कब तक वे अपनी साख बचा पायेंगे? चूंकि, अब वे देश के प्रधानमंत्राी हैं। इसलिए उन्हें जुबान खोलनी पड़ेगी। खामोशी उन्हें और बदनाम कर रही है। काॅमनवेल्थ खेल घोटाले में प्रधानमंत्राी ने फटाफट जिस तरह जांच का आदेश दिया, वैसी तत्परता उन्होंने 2जी स्पेक्ट्रम और कोलगेट कांड में नहीं दिखाई। 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में तो ए.राजा के कारण प्रधानमंत्राी को राहत मिल गई, मगर कोल गेट कांड में तो सीधे-सीधे कांग्रेसी लोग ही शामिल नजर आ रहे हैं। इस मामले में अब सरकार किसको बलि का बकरा बनायेगी? आम जनता सरकार से उम्मीद करती है कि वह पूरे देश की जनता की स्वास्थ्य सुविधाओं की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले। स्वास्थ्य सुविधाओं के साथ एजुकेशन का भी भार सरकार वहन करे। आज आम आदमी की सबसे बड़ी समस्या स्वास्थ्य एवं एजुकेशन को लेकर है। सरकारी अस्पतालों एवं सरकारी स्कूलों के बस की बात नहीं कि वे सबका इलाज कर सकें एवं सबको एजुकेशन दे सकें।

प्राइवेट अस्पतालों में इलाज करवा पाना आम आदमी के बस की बात नहीं है। अपना घर-मकान बेचकर भी आम आदमी प्राइवेट अस्पतालों का खर्च वहन नहीं कर सकता। यही हाल प्राइवेट स्कूलों का भी है। प्राइवेट स्कूलों में अपने बच्चों को पढ़ाना बहुत मुश्किल ही नहीं बल्कि असंभव भी है।

आज मांग की जा रही है कि एम्स जैसे अस्पताल हर राज्य में बनने चाहिए। हर राज्य की बात छोड़िये एम्स जैसे अस्पतालों की जरूरत हर जिले में है। एम्स में लोग अपनी बारी का इंतजार करते-करते ऊपर चले जाते हैं। यदि देश में जगह-जगह एम्स जैसे हाॅस्पिटल हो जायें तो समस्या का काफी समाधान हो सकता है, मगर यह सब तब हो सकता है। जब सरकारी खजाने में पर्याप्त पैसा हो। सरकारी खजाने में पर्याप्त पैसा तब  आयेगा, जब भ्रष्टाचार कम होगा।

कुल मिलाकर कहने का आशय यही है कि जब तक भ्रष्टाचार पर अंकुश नहीं लगेगा, तब तक कुछ भी नहीं होने वाला है। आम जनता इसी प्रकार घोटालों की गिनती करने के लिए विवश होगी। सरकार जन लोकपाल के नाम पर कहती है कि इससे भ्रष्टाचार नहीं रुकेगा तो सरकार वही उपाय करे, जिससे भ्रष्टाचार रुक सकता है, मगर सरकार कुछ करे तो सही।