संसदीय गरिमा को बरकरार रखने की गंभीर चुनौती


संपादकीय मई 2012

हमारे देश की संसदीय व्यवस्था दुनिया की एक उत्कृष्ट व्यवस्था मानी जाती है, मगर अब जिस प्रकार की गिरावट संसदीय व्यवस्था में देखी जा रही है, उससे देश का आमजन आहत  है। जिस संसदीय व्यवस्था के वाहक पंडित जवाहर लाल नेहरु, लालबहादुर शास्त्राी, जीवी मावलंकर, अटल बिहारी वाजपेयी, सोमनाथ चटर्जी जैसे लोग रह चुके हों, आज उसका स्तर कहां से कहां पहुंच गया है? किसी जमाने में संसद में जब किसी मुद्दे पर बहस हुआ करती थी तो पूरा देश इस बात का इंतजार करता रहता था कि अखिर बहस में क्या हुआ।

वर्तमान परिस्थितियों में आम तौर पर जब किसी विषय पर संसद में बहस होती है तो अधिकांश सीटें खाली रहती हैं। आखिर इस प्रकार की स्थिति क्यों उत्पन्न होती है? उस पर विचार किये जाने की आवश्यकता है। या तो सांसद विषय की गंभीरता न समझते हों या फिर उन्हें लगता हो कि संसद में बैठकर बेवजह समय क्यों बर्बाद किया जाये। जितनी देर वे संसद में रहेंगे, उतने समय में कुछ और काम कर लेंगे। पहले माना जाता था कि संसद का काम कानून बनाना है। वह विधायी संस्था है। इसलिए संसद का पचास प्रतिशत समय कानून बनाने में लगता था, लेकिन आज ऐसा नहीं है। पिछली तीन लोकसभा में संसद ने अपना केवल 12 से 15 प्रतिशत समय ही कानून बनाने में खर्च किया है जिसके आधार पर यह निष्कर्ष निकलता है कि अब संसद केवल 13 प्रतिशत समय ही कानून बनाने में खर्च करती है। यही वजह है कि जब भी संसद में किसी बिल पर बहस होती है तो अधिकांश सदस्यों की उपस्थिति न के बराबर होती है जिससे साफ जाहिर होता है कि सदस्यों का रुझान काफी हद तक इस काम में कम हुआ है जबकि पहले ऐसा नहीं होता था। पहले ऐसे मौकों पर सदस्य खूब बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे। खूब बहस होती थी।

तेरह मई को भारत की संसद के 60 साल पूरे हो जायेंगे। इन साठ सालों के दौर में संसद ने काफी उतार-चढ़ाव देखे हैं। पहले संसद में अभिजात्य वर्ग के अधिक लोग आते थे, तब आम आदमी एवं किसानों की समस्याओं को लेकर बहुत अधिक चर्चा होती मगर आज ऐसे सदस्यों की संख्या बहुत अधिक है, जो किसान परिवार से आये हैं, मगर इसके बावजूद संसद में किसानों की समस्याओं को लेकर कोई सार्थक बहस नहीं हो पा रही है। किसान ही किसानों की समस्साएं सुलझाने में न रुचि लें तो भला कौन लेगा?

संसदीय लोकतंत्रा एवं संसदीय मर्यादाओं को बरकरार रखने में विपक्ष की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होती है, मगर कहा जा रहा है कि आज का विपक्ष पहले जैसा मजबूत नहीं है। विपक्ष की मजबूती का मतलब सिर्फ संख्या बल से नहीं है। विपक्ष संख्या में भले ही कम हो, मगर महत्वपूर्ण बात यह है कि विपक्ष में कैसे लोग बैठे हैं? संख्या में कम होते हुए भी पहले विपक्ष अपनी भूमिका का निर्वाह बखूबी करता है। आज तो  विपक्ष की ऐसी स्थिति बन चुकी है कि विरोध सिर्फ दिखावे या औपचारिकता के लिए होता है। आम तौर पर पूरे देश के जनमानस में एक भावना घर करती जा रही है कि पक्ष-विपक्ष सभी एक जैसे हैं। पार्टी चलाने, प्रत्याशी तय करने सहित तमाम मामलों में थोड़े-बहुत अंतरों के साथ सबका रवैया एक जैसा है। सत्ता पक्ष के चरित्रा में गिरावट आने पर जनता यदि विपक्ष को हाथों-हाथ उठा ले तो सत्ता पक्ष भी अपने बारे में आत्म मंथन करने के लिए मजबूर हो जायेगा मगर यहां तो स्थिति दोनों तरफ एक ही जैसी बनी हुई है। आज आवश्यकता इस बात की है कि संसदीय गरिमा की रक्षा के लिए सभी लोग मिलकर प्रयास करें।