सृष्टि की उत्पत्ति के बाद से ही जब से जीवन की रचना हुई है तभी से प्राणियों में समूहों में रहने की परंपरा विद्यमान रही है। समूहों में रहने के कारण प्राणियों में सर्वदा संवाद होता रहता था। प्राणियों की इसी प्रवृत्ति के कारण संवाद का विशेष महत्व रहा है। मानव, पशु-पक्षी, जलचर या कोई भी वनस्पति ही क्यों न हों, सभी में आपसी संवाद रहा है। यदि इसका विश्लेषण किया जाये तो स्पष्ट हो जायेगा कि यह अपने आप में ऐतिहासिक सत्य है। यदि सिर्फ मानव समाज की बात की जाये तो इसका जन्म ही संवाद से हुआ है।
संवाद किन्ही दो या दो से अधिक व्यक्तियों के बीच समझने-समझाने, सीखने-सिखाने, मूक हो या लिखित, सांकेतिक हो या नाटकीय, एक वार्तालाप है जिससे आचार-विचार और भाव आदि का आदान-प्रदान पंचायत, डिबेट, प्रतियोगिता, सत्संग इत्यादि सभी संवाद के प्रकार हैं। संवाद से सुख बंटे या न बंटे किंतु दुख तो बंट ही जाता है। दुख यदि पूरी तरह न भी बंट पाता है तो मन तो हल्का हो ही जाता है इसीलिए समाज में एक धारणा बहुत ही व्यापक रूप में प्रचलित है कि किसी के सुख में भले ही न जाया जाये किंतु उसके दुख में अवश्य जाना चाहिए। दुख में पहुंचने के पीछे का भाव यही है कि यदि लोग किसी के गम में उपस्थित होकर उससे संवाद करेंगे और तरह-तरह से सांत्वना, सहानुभूति, संवेदना व्यक्त करने के साथ साहस भी देंगे तो व्यक्ति में फिर से खड़ा होने एवं कष्ट से उबरने की क्षमता विकसित होगी इसीलिए संवाद का चलते रहना नितांत आवश्यक है किंतु आजकल समाज में देखने को मिल रहा है कि संवादहीनता एक विकराल समस्या का रूप लेती जा रही है। घर-परिवार, समाज, राजनीति एवं अन्य सभी स्तर पर यह समस्या देखने को मिल रही है। लोगों में आपसी बातचीत एवं वार्तालाप लगातार कम होता जा रहा है।
आज समाज में तमाम लोग ऐसे हैं जिनका स्पष्ट रूप से मानना है कि मैं समाज एवं राष्ट्र की परवाह क्यों करूं? मेरे अकेले परवाह न करने से क्या फर्क पड़ता है? किंतु प्रश्न यह है कि यदि देश के प्रत्येक नागरिक यदि यही सोच लें तो क्या होगा? कुल मिलाकर कहने का आशय यही है कि समाज में प्रत्येक क्षेत्रा में संवादहीनता की स्थिति उत्पन्न हो रही है। इसका सबसे प्रमुख कारण यह है कि लोग अपने आप में सिमटते जा रहे हैं। मैं और मेरा परिवार की भावना बहुत व्यापक रूप से आगे बढ़ रही है। परिवार भी ऐसा नहीं कि जिसमें दादी-दादा, चाचा-ताऊ आदि लोग भी समाहित हों? परिवर का अर्थ मुख्य रूप से ‘हम दो – हमारे दो’ तक सीमित हो गया है। लोगों में करुणा, संवेदना, दया, सहानुभूति आदि मानवीय गुणों का अभाव होता जा रहा है।
संवाद से न केवल भ्रमों और संदेहों का निवारण होता है अपितु सही दिशा और मार्गदर्शन भी मिल जाता है क्योंकि व्यक्ति के मन में तमाम तरह के सकारात्मक और नकारात्मक विचार पनपते रहते हैं। यदि व्यक्ति हमेशा किसी न किसी रूप में संवाद एवं आपसी बातचीत करता रहे तो किसी भी समस्या का कोई न कोई हल निकल आता है और जीवन की गाड़ी भी सकारात्मक दिशा में बढ़ जाती है यानी व्यक्ति का आचरण समन्वयकारी भी बनता जाता है।
वर्तमान स्थिति का यदि विश्लेषण किया जाये तो देखने में आ रहा है कि परिवार टूट रहे हैं, समाज बिखर रहा है, संस्कार क्षीण हो रहे हैं, सभ्यता-संस्कृति ध्वस्त हो रही है, राष्ट्र भावना कमजोर पड़ रही है, लोगों का स्वयं में केंदित होने के कारण स्वार्थसिद्धि की भावना हावी हो रही है। परस्पर संवादहीनता के कारण लोगों में मतभेद, मनमुटाव इस कदर दरार में परिवर्तित हो रहे हैं कि दुबारा दिलों का जुड़ना मुश्किल ही नहीं बल्कि असंभव भी होता जा रहा है। संवादहीनता के अभाव एवं एकाकीपन के कारण लोगों में अवसाद (डिप्रेशन) बढ़ रहा है जिससे हताशा और निराशा बढ़ती जा रही है।
मानव संस्कृति एवं समाज के प्रत्येक क्षेत्रा में संवाद एक मौलिक मुद्दा रहा है। कहना और बोलना जितना आवश्यक है, उतना ही सुनना भी। अंग्रेजी में एक कहावत बहुत ही प्रचलित है कि- Speech is silver but silence is gold यानी बोलना चांदी के समान है तो चुप रहना सोने की तरह है अर्थात सुनना भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि बोलना। पहले गली-मोहल्लों, चौपाल, सत्संग, स्कूलों-कॉलेजों, पंचायतों, सत्संगों एवं धार्मिक चर्चाओं के माध्यम से एवं अन्य भिन्न-भिन्न तरीकों से संवाद होता एवं चलता रहता था जिससे समाज संवादरत रहता था। संवाद भी तार्किक, चिंतनशील व विचारवान होते रहते थे। वैसे भी देखा जाये तो संवाद भाषा और संस्कृति का एक मूल संभाग है।
इतिहास गवाह है कि पूरी दुनिया में तमाम लड़ाइयां संवाद के कारण टल गईं। यदि लड़ाइयां हुईं भी तो संवाद के द्वारा सुलझाकर उनका समाधान भी हो गया। यदि आधुनिक भारत की बात की जाये तो 1962 में चीन के साथ लड़ाई, 1965 और 1971 में पाकिस्तान के साथ लड़ाइयों का अंत आपसी संवाद के द्वारा ही हुआ। पूरे विश्व में तमाम छोटी-बड़ी समस्याओं का समाधान संवाद के द्वारा होता आया है। राष्ट्रीय हितों के तमाम मामलों की बात की जाये तो देखने में आ रहा है कि संवादहीनता के कारण चिंताजनक स्थिति बन रही है। किसी भी कीमत पर इन मामलों में संवाद का होना बहुत आवश्यक है।
संवादहीनता के कारणों पर नजर डाली जाये तो स्पष्ट रूप से पता चलता है कि इसके प्रमुख कारणों में डिजिटलाइजेशन, टेलीफोन, टीवी, स्मार्टफोन, सोशल मीडिया के तमाम माध्यम प्रमुख हैं। वर्तमान समय में फेसबुक, वाट्सअप, इंस्टाग्राम, यू-ट्यूब, ईमेल आदि ऐसे तमाम माध्यम हैं, जिसके द्वारा लोग एक दूसरे से जुड़े रहना चाहते हैं जबकि वास्तविकता यह है कि इन माध्यमों से जुड़ाव होने की बजाय समाज सम्पर्कहीनता की तरफ बढ़ रहा है। इसके अतिरिक्त पाश्चात्य सभ्यता-संस्कृति का अत्यधिक प्रभाव पड़ने के कारण भारतीय समाज भी तेजी से भौतिकवाद की तरफ अग्रसर हुआ है।
भौतिकवाद का सीधा सा अर्थ है कि अर्थ आधारित ऐशो-आराम की जिन्दगी की चाहत। ऐशो-आराम की जिन्दगी की चाहत में लोग ‘येन-केन-प्रकारेण’ अर्थ यानी धन कमाने में लगे हैं। धन कमाने की चाहत में यदि संस्कारों एवं नैतिक मूल्यों को भी ताक पर रखना पड़े तो भी लोगों को कोई गुरेज नहीं है। कुल मिलाकर उद्देश्य यह हो गया है कि पैसा आना चाहिए किंतु पैसा किस तरह आ रहा है, इस बात की कोई चर्चा नहीं हो रही है। नैतिक मूल्यों की बात तो तब समझ में आयेगी जब श्रेष्ठजनों एवं बुजुर्गों के साथ बैठकर या उनकी संगत में रहकर संवाद होगा। संवादहीनता के अभाव में प्रकृति प्रेम तो मात्रा चंद लोगों की जिम्मेदारी रह गई है। ये वो लोग हैं जो आज भी अपनी प्राचीन सभ्यता-संस्कृति में विश्वास रखते हैं और उसको ही सर्वोच्च मानते हैं।
संवाद के महत्व का यदि विश्लेषण किया जाये तो इसका महत्व सभी युगों में रहा है। त्रोता युग में स्वयं प्रभु श्री राम ने संवाद के महत्व को स्थापित किया है। माता सीता के हरण के बाद उन्होंने पशु-पक्षियों, पेड़-पौधों एवं पशुओं से भी संवाद किया था। श्रीराम चरित मानस में महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा है कि, हे खग – हे मृग, मधुकर श्रेनी, तुम देखी सीता मृगनयनी यानी प्रभु श्रीराम ने पक्षियों एवं अन्य प्राणियों से भी पूछा था कि क्या उन्होंने माता सीता को देखा है। रावण को समझाने के लिए प्रभु श्रीराम ने महाबली हनुमान एवं बालि पुत्रा अंगद को भी लंका भेजा था। समुद्र पर सेतु बनाने के लिए उन्होंने नल-नील सहित बहुत लोगों की मदद ली थी। इसके पहले उनका स्वयं समुद्र से भी संवाद हुआ था। प्रभु श्रीराम तो स्वयं भगवान थे। वे क्या नहीं कर सकते थे, किंतु उन्होंने हर काम करने के लिए संवाद स्थापित किया था यानी संवाद किसी भी समस्या के समाधान के लिए अति आवश्यक है।
इसी प्रकार यदि द्वापर युग की बात की जाये तो महाभारत में भगवान श्रीकृष्ण सब कुछ जानते थे किंतु उन्होंने कदम-कदम पर संवाद कायम किया था। भीष्म पितामह, गुरु द्रोणाचार्य, दानवीर कर्ण जैसे लोग जो कौरव सेना के सेनापति थे, उनसे भी संवाद कायम किया था। इससे महत्वपूर्ण बात यह है कि युद्ध के मैदान में जब अर्जुन को मोह व्याप्त हो गया और वे लड़ाई से दूर भागने लगे तो भगवान श्रीकृष्ण ने मैदान में ही उन्हें ज्ञान दिया जिससे अर्जुन का मोह भंग हुआ और वे लड़ाई के लिए तैयार हुए। कहने का आशय यही है कि यदि भगवान श्रीकृष्ण चाहते तो अपनी दिव्य शक्ति से अर्जुन सहित किसी का भी दिमाग परिवर्तित कर सकते थे किंतु उन्होंने जो कुछ भी किया, सब संवाद के माध्यम से ही किया। भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत के युद्ध में अर्जुन से संवाद कर जो भी ज्ञान दिया था, आज उसी को भगवद्गीता कहा जाता है। इससे समाज को एक दिशा मिल रही है। भगवद्गीता में हर समस्या का समाधान है।
हमारे वेदों-पुराणों एवं शास्त्रों में लिखा है कि समय-समय पर भिन्न-भिन्न देवताओं के बीच हुए संवाद के द्वारा हर प्रकार की छोटी-बड़ी समस्याओं का निदान हुआ है। भगवद्गीता तो इसका सबसे प्रमुख उदाहरण है। संवाद को माध्यम बनाकर ही गीता के उपदेश को प्रतिपादित किया गया था। प्राचीनकाल में तो ऋषि-मुनि, पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों एवं प्रकृति के अन्य प्राणियों के साथ संवाद किया करते थे जिससे उन्हें किसी भी प्राकृतिक आपदा एवं अनहोनी की पहले से ही जानकारी मिल जाती थी और वे समाज एवं राज्यसत्ता को सचेत कर देते थे किंतु वे भी इसके लिए संवाद का ही सहारा लेते थे।
हमारे समाज में समय-समय पर पर्व एवं त्यौहार मनाने की परंपरा विद्यमान रही है। इसका प्रमुख उद्देश्य यही है कि लोग अपना मतभेद भुलाकर इन अवसरों पर खुले दिल से एक दूसरे से मिल-जुल सकें और आपस में संवाद कायम कर सकें। संवाद के माध्यम से लोगों में सामूहिकता का भी विकास होता है।
प्राचीनकाल में लोग जब यात्रा पर जाते थे तो लोगों में आपसी संवाद एवं मेल-मिलाप बढ़ता था परंतु आज तो बस, ट्रेन, प्लेटफार्म एवं किसी भी अन्य सार्वजनिक स्थान पर संवाद करने के बजाय लोग स्मार्ट फोन, लैपटाप पर ही व्यस्त रहते हैं यानी पास बैठने पर भी संवादहीनता का दौर जारी है।
शादी एवं अन्य सुख-दुख के अवसरों पर लोगों के पास जाकर निमंत्राण देने की परंपरा हमारे समाज में बहुत पहले से प्रचलित रही है, इससे लोगों का मिलना-जुलना एवं आपस में संवाद हो जाता था किंतु आज तो निमंत्राण पत्रा भी ‘ऑन लाईन’ आने लगे हैं। कहने का आशय सिर्फ यही है कि संवाद के सभी रास्ते धीरे-धीरे बंद होते जा रहे हैं।
कुल मिलाकर कहने का आशय यही है कि सृष्टि को बचाये रखना है और अपनी सभ्यता-संस्कृति एवं नैतिक मूल्यों को बचाये रखना है तो कदम-कदम पर ‘संवाद’ को बढ़ाने एवं प्रोत्साहित करने की नितांत आवश्यकता है अन्यथा एक समय ऐसा आयेगा जब मानव सबसे कटा हुआ सिर्फ अपने आप में ही व्यस्त मिलेगा। सबसे कटे होने का मतलब है जीवन में निराशा एवं हताशा को आमंत्रित करना।
– अरूण कुमार जैन (इंजीनियर)
(लेखक राम-जन्मभूमि न्यास के
ट्रस्टी रहे हैं और भा.ज.पा. केन्द्रीय
कार्यालय के कार्यालय सचिव रहे हैं)