भारत सहित पूरी दुनिया में आर्थिक मंदी की आहट महसूस होने लगी है। लोग अपने-अपने हिसाब से आर्थिक मंदी की व्याख्या कर रहे हैं तो सरकार और अर्थशास्त्री इस पर अलग तरह से सोच-विचार कर रहे हैं तो विपक्षी दलों का अपना अलग नजरिया है। आर्थिक मंदी की आहट सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में महसूस की जा रही है। सरकार और अर्थशास्त्रियों की चाहे जो भी राय हो किंतु इतना निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि यदि इसका विश्लेषण ठीक से किया जाये तो आर्थिक मंदी के कारण कुछ और ही मिलेंगे। पूरीं दुनिया में हथियारों की होड़ एक प्रमुख कारण है।
दुनिया के अधिकांश देशों को लगता है कि यदि उन्हें सुरक्षित रहना है तो पर्याप्त मात्र में हथियार जरूरी है और इन्हीं हथियारों को खरीदने एवं बनाने में तमाम देशों की पर्याप्त धन राशि खर्च हो रही है। अगर विश्व के किसी कोने में आपसी लड़ाई-झगड़ा न हो तो भी एक निश्चित समय के बाद हथियारों एवं गोला-बारूद को नष्ट करना पड़ता है क्योंकि वह अनुपयोगी हो जाता है। इन गोला-बारूदों को नष्ट करने से धन की काफी बर्बादी
होती है।
यदि देखा जाये तो अधिकांश देश अपना रक्षा बजट बढ़ाते जा रहे हैं। ऐसे में यह सोचा जा सकता है कि यदि सभी देश रक्षा बजट बढ़ाते जा रहे हैं और हथियार एकत्रित करने के लिए भारी धन राशि खर्च कर रहे हैं तो आर्थिक मंदी तो आयेगी ही। इसी के साथ एक प्रमुख बात यह है कि दुनिया के जो गिने-चुने विकसित देश हैं उनकी इच्छा यही होती है कि पूरे विश्व में युद्ध जैसी स्थिति बनी रहे जिससे हथियार बेचने की उनकी दुकानदारी चलती रहे। उदाहरण के तौर पर हांगकांग में अशांति है तो वहां सेना हथियार खरीदने पर जरूर विचार करेगी। अफगानिस्तान में उथल-पुथल है तो हथियारों की जरूरत तो बनी रहेगी। भारत-पाकिस्तान के बीच आये दिन गोलीबारी की खबरें देखने एवं सुनने को मिलती रहती हैं।
कहने का आशय यही है कि दुनिया में तमाम ऐसे देश हैं जहां युद्ध जैसे हालात बने रहते हैं। ऐसे में उन्हीं देशों को सबसे अधिक लाभ होगा जो हथियार बेचते हैं लेकिन जब हथियारों की बिक्री नहीं होगी तो उनके यहां आर्थिक मंदी आयेगी ही। ऐसे में यह कहा जा सकता है कि हथियारों की होड़ से आर्थिक मंदी को बढ़ावा मिलता है।
हथियारों की प्रतिस्पर्धा के साथ पूरी दुनिया में उपभोक्तावादी संस्कृति बहुत तेजी से पनप रही है। पाश्चात्य देशों की देखा-देखी भारत में भी उपभोक्तावादी संस्कृति बहुत तेजी से फल-फूल रही है। ‘आमदनी अठन्नी-खर्चा रुपैया’ वाली कहावत वर्तमान समय में खूब चरितार्थ हो रही है। भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह अकसर कहा करते हैं कि ‘ऋण लेकर घी पीने की प्रवृत्ति ठीक नहीं है’ यानी उधार लेकर यदि व्यक्ति कोई कार्य करेगा तो उसे भरना ही होगा। कर्ज बढ़ते-बढ़ते जब अधिक हो जाता है तो व्यक्ति परेशान हो जाता है। पैसा हो या न हो किंतु कर्ज लेकर ऐशो-आराम की जिंदगी जीने की चाहत निश्चित रूप से परेशानी में डालती है और आर्थिक मंदी को बढ़ावा भी देती है इसीलिए भारतीय सभ्यता-संस्कृति में एक बात बहुत प्रचलित है कि ‘पांव उतना ही फैलाना चाहिए, जितनी बड़ी चादर हो’ यानी अपनी सामर्थ्य के अनुसार ही व्यक्ति को खर्च करने की आदत डालनी चाहिए।
लागत और बिक्री के बीच भारी अंतर भी कहीं न कहीं से आर्थिक मंदी में मददगार साबित होता है। उदाहरण के तौर पर किसी सामान की लागत यदि दस रुपये पड़ती है और उपभोक्ता के पास जाते-जाते उसकी कीमत सौ रुपये हो जाये तो लागत के मुताबिक बिक्री बहुत ज्यादा हो जाती है। यह बीच का अन्तर प्रचार-प्रसार, अनावश्यक गुणगान व मार्केटिंग पर खर्च हो जाता है जो न केवल अनुपयोगी होता है बल्कि भ्रमित करता है और अर्थ का क्षय होता है, इससे भी असंतुलन होता है। असंतुलन किसी भी प्रकार का हो उससे समस्या ही पैदा होती है। आर्थिक मंदी को बढ़ावा देने में कहीं न कहीं से यह कारण भी जिम्मेदार है।
मानव शक्ति का पूरी तरह उपयोग न हो पाना भी आर्थिक मंदी की एक प्रमुख वजह है। काम करने के लिए हाथ तो हैं किंतु उन हाथों के लिए काम नहीं है। ऐसी स्थिति में तो आर्थिक मंदी बढ़ेगी ही। अत्यधिक आधुनिकीकरण की होड़ में मशीनों ने मनुष्यों का काम छीन लिया है। हालात तो यहां तक पहुंच गये हैं कि हर काम के लिए अब रोबोट आने लगे हैं। रोबोट के अधिकाधिक प्रयोग से मानव शक्ति बेकार होगी और नयी-नयी समस्याएं भी पैदा होंगी। निश्चित रूप से यह स्थिति आर्थिक मंदी को बढ़ावा ही देगी।
पर्यावरण की अनदेखी कर जिस प्रकार की विकास यात्रा चल रही है उससे भी आर्थिक मंदी को बढ़ावा मिलता है। विकास के नाम पर कदम-कदम पर प्रकृति से छेड़छाड़ हो रही है। प्रकृति के माध्यम से किसी समय जो चीजें मुफ्त में लोगों को मिलती थीं आज उसका पैसा देना पड़ रहा है। पीने के पानी जैसी चीज भी आज खरीदी-बेची जाती है। विदेशों में तो शुद्ध हवा की भी खरीद-फरोख्त शुरू हो चुकी है। प्रकृति से दूरी बनाने के कारण लोग अस्वस्थ रहने लगे हैं। अस्वस्थ होने की वजह से कमाई का बड़ा हिस्सा इलाज में खर्च हो रहा है। अनावश्यक खर्च किसी न किसी रूप में आर्थिक मंदी को ही बढ़ावा देता है। जो चीजें हमें प्रकृति से मिलती थीं, उसे पैसे से क्यों खरीदा जाये यानी कदम-कदम पर खर्च बढ़ने की स्थितियां निर्मित होती जा रही हैं, ऐसे में आर्थिक मंदी का सामना तो करना ही पड़ेगा।
यूपीए की सरकार में जब महंगाई ज्यादा बढ़ने लगी और सरकार की चौतरफा आलोचना होने लगी थी तो उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने कहा था कि भारत में लोग अब ज्यादा खाने लगे हैं इसलिए महंगाई बढ़ रही है। इसी प्रकार कांग्रेस के कई नेताओं ने कहा था कि लोगों की कमाई अब ज्यादा हो गई है तो लोग अब अधिक खरीददारी करने लगे हैं, ऐसे में महंगाई तो बढ़ेगी ही। कहने का आशय यह है कि किसी भी समस्या के समाधान के बजाय उस समस्या से लोगों का ध्यान भटकाने के लिए इधर-उधर की बातें ज्यादा होने लगती हैं।
आर्थिक मंदी से निपटने के उपायों एवं तौर-तरीकों पर बात की जाये तो लोगों को प्राकृतिक जीवन की तरफ पुनः आना ही होगा। प्राकृतिक जीवन शैली में व्यक्ति की आवश्यकताएं कम होने लगती हैं। जब आवश्यकता कम होगी तो खर्च भी कम होगा, इससे लोग आर्थिक संकट की चपेट में आने से बच जायेंगे। प्रकृति के करीब आने से लोग स्वस्थ, सुखी एवं संतुष्ट होंगे तो प्राकृतिक आपदायें भी कम झेलनी पड़ेंगी। प्राकृतिक आपदाओं से जन-धन की बहुत बर्बादी होती है। इस बर्बादी की पूर्ति किसी न किसी रूप में कहीं न कहीं से करनी ही पड़ती है। अनावश्यक जन-धन की बर्बादी से आर्थिक असंतुलन को ही बढ़ावा मिलता है। मानव श्रम पर आधारित लघु एवं कुटीर उद्योगों को यदि बढ़ावा दिया जाये तो आर्थिक मंदी जैसे संकट से उबरा जा सकता है। लोगों को अपने घर पर रहते हुए यदि कम लागत वाले छोटे-छोटे कार्य करने से आमदनी होने लगे तो लोगों के जीवन में खुशहाली आनी शुरू हो जायेगी। व्यापक स्तर पर बड़े उद्योग लगाना सबके वश में नहीं होता। वैसे भी बहुत ही प्रचलित कहावत है कि ‘खाली दिमाग-शैतान का डेरा’ यानी जो व्यक्ति खाली या बेरोजगार होगा तो उसके दिमाग में ऊल-जुलूल विचार आते ही रहेंगे तो वह किसी भी प्रकार की खुराफात कर सकता है।
ऐशो-आराम की जिंदगी त्याग कर यदि परंपरागत जीवन शैली को अपनाया जाये तो आर्थिक मंदी से निजात पाई जा सकती है। आवश्यकता से अधिक ऐशो-आराम की जिंदगी व्यक्ति को आर्थिक संकट में ही डालती है। अर्थव्यवस्था को लेकर समय-समय पर जो भय का वातावरण उत्पन्न किया जाता है, उससे बाहर निकल कर समस्याओं का सामना करना चाहिए। आर्थिक मंदी को लेकर तमाम तरह की अफवाहें उड़ाई जाती हैं उससे बचने एवं सावधान होने की जरूरत होती है।
आर्थिक मंदी की अफवाहों को एक उदाहरण से भी समझा जा सकता है। यदि किसी व्यक्ति को यह कह दिया जाये कि भविष्य में उसे कैंसर होने की संभावना है तो उसी दिन से वह परेशान रहने लगेगा यानी उसके दिमाग में यह बात घर कर जायेगी कि उसे कैंसर होने वाला है। इससे वह कुछ भी नया कार्य करने की बजाय सिर्फ बची हुई जिंदगी को पूरा करने और अपनी कुछ प्रमुख जिम्मेदारियों के निर्वहन में लग जायेगा। कुछ इसी प्रकार की बातें आर्थिक मंदी एवं अर्थव्यवस्था के बारे में भी देखने को मिलती रहती हैं। उदाहरण के तौर पर यूपीए सरकार में श्री शरद पवार जब मंत्री थे तो आये दिन कुछ न कुछ वक्तव्य देकर छद्म महंगाई बढ़ाते रहते थे।
इन सब बिन्दुओं के अतिरिक्त बड़े देशों पर निर्भरता एवं झुकाव बहुत लाभकारी साबित नहीं होता है। बड़े देशों से बहुत अधिक अपेक्षा पालने के बजाय अपने आप को ही समृद्ध बनाने का प्रयास करना चाहिए। समय-समय पर बड़े देशों में आपसी प्रतिस्पर्धा कि हम सबमें कौन बड़ा, कौन नम्बर एक, कौन करेगा, विश्व व्यापार का संचालन आदि जैसी मानसिकताएं छोटे देशों पर अधिकाधिक प्रभाव डालती हैं। कहने का आशय यही है कि जब हम स्वयं में सक्षम नहीं होंगे तो दूसरों की मदद क्या करेंगे? इन सब बातों के अतिरिक्त हर व्यवस्था का एक चक्र होता है। यदि वह चक्र ठीक प्रकार से चलता रहता है तो सारी व्यवस्था ठीक से चलती रहती है। यदि बीच में कोई चक्र टूट जाता है तो व्यवस्था गड़बड़ा जाती है। अर्थव्यवस्था चक्र भी ठीक उसी प्रकार का है, जैसे प्रकृति ने जल-चक्र, वायु-चक्र, जीवन-चक्र इत्यादि का सृजन किया है। इस चक्र में कभी भी किसी वस्तु का क्षय नहीं होता है। प्रकृति का यह चक्र अनादि काल से चला आ रहा है किंतु वर्तमान परिस्थितियों में उपरोक्त सभी अनदेखियों के कारण अर्थव्यवस्था में एक बहुत बड़ा भाग उस चक्र से बाहर हो जाता है और विश्व के गिने-चुने लोगों के हाथों में चला जाता है जिनकी पूंजी मुद्दत से दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है। चाहे विश्व में तेजी हो या मंदी। यहीं से अर्थ क्षय होना शुरू हो जाता है। यह भाग अनुपयोगी होने के कारण बाहर होता है या किसी अन्य कारण से किन्तु उसे पुनः प्राप्त करने के लिए या पुनः चक्र में लाने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ती है और इन्हीं परिस्थितियों में आर्थिक मंदी की आहट सुनाई पड़ने लगती है।
इन सब बातों के अतिरिक्त भारतीय सभ्यता-संस्कृति में सदा से ही एक बात कही जाती है कि कमाई चाहे जितनी भी कम हो, व्यक्ति को उसी में गुजारा करना चाहिए। उधार मांग कर जीवन नहीं जीना चाहिए। कितनी भी आमदनी हो, उसी में से थोड़ी-थोड़ी पूंजी निकालकर भविष्य के लिए बचाना चाहिए। मुसीबत में यही पूंजी काम करेगी। पुराने मकान जब कभी तोड़े जाते थे तो उसमें से सोने-चांदी के सिक्के, बर्तनों एवं मटकों में रखे पैसे भी मिल जाते थे किंतु अब यह बात देखने को नहीं मिलती है। आज का समय तो वर्तमान में जीने का है। तमाम लोगों का कहना है कि वर्तमान चाहे जैसा भी हो उसका आनंद लेना चाहिए। वर्तमान ठीक होगा तो भविष्य अपने आप ठीक हो जायेगा किंतु यह सोच लोगों को धोखा दे रही है और तमाम मामलों में निराशा ही हाथ लगती है। अतः हमें अपनी उस पुरानी सोच पर आना ही होगा।
इसके अलावा एक बात समाज में यह भी देखने को मिल रही है कि एक तबका ऐसा भी है जिसका मानना एवं सोचना है कि पहले अपनी आवश्यकता बढ़ा लो फिर उसे पूरा करने के लिए प्रयास करो। इस सोच में पड़कर लोग लोन भी ले लेते हैं किंतु भविष्य में उस लोन की भरपाई की उचित व्यवस्था नहीं बन पाती है तो विवश होकर आत्महत्या भी करनी पड़ जाती है। इस संदर्भ में सामान्य लोगों की बात ही छोड़ दीजिए, बड़े-बड़े उद्योगपति भी आत्महत्या कर रहे हैं यानी यहां भी अपनी पुरानी सोच एवं पुराने तरीके ही प्रभावी साबित हो रहे हैं। आधुनिकता एवं भौतिकवादी दौर में पुराने फार्मूले एवं तौर-तरीके भले ही गुजरे जमाने के आइटम लगते हैं किंतु उसी गुजरे जमाने के दौर में लौटने के सिवाय दूसरा कोई रास्ता नहीं है क्योंकि वही गुजरे जमाने के फार्मूले ही स्थायी हैं। यदि लोगों को सुख-चैन से रहना है तो उपरोक्त सभी बातों पर अमल करना ही होगा। इसी में सभी का कल्याण निहित है। यह कार्य आज नहीं तो कल करना ही होगा तो क्यों न समय रहते अभी से प्रारंभ कर दिया जाये तो आइये, बढ़ चलें इसी रास्ते पर।
– अरूण कुमार जैन (इंजीनियर)
(लेखक राम-जन्मभूमि न्यास के
ट्रस्टी रहे हैं और भा.ज.पा. केन्द्रीय
कार्यालय के कार्यालय सचिव रहे हैं)