राजनैतिक शुद्धिकरण समय की मांग


वर्तमान समय भारतीय राजनीति के लिए संक्रमण का समय है। राजनैतिक क्षेत्र में इतना भ्रष्टाचार है कि उससे पूरा परिवेश ही दूषित हो गया है। उत्तर प्रदेश के मुजफ्फर नगर में सांप्रदायिक दंगा हुआ। इस दंगे में देखने में आया कि उत्तर प्रदेश सरकार पूरी तरह से फेल साबित हुई है, उसके बाद शासन-प्रशासन की तरफ से जो भी कार्रवाई हो रही है उसको भी निष्पक्ष भी नहीं कहा जा सकता है।

सरकार की कार्रवाई देखकर ऐसा लगता है कि वह राजनैतिक नफा-नुकसान को नजर में रखकर की गई है। उत्तर प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से आम जनता को काफी उम्मीदें थीं, लेकिन अभी तक लोगों ने उनके अंदर ऐसी कोई काबिलियत नहीं देखी, जिससे प्रदेशवासियों को इस बात का अहसास हो सके कि भविष्य में उनसे कोई उम्मीद की जा सके। हाल-फिलहाल की राजनीति में एक पक्ष तो यह देखने को मिला कि सांप्रदायिक सौहार्द का दावा करने वाले लोग सांप्रदायिक दंगा रोक पाने में पूरी तरह नाकाम साबित हुए हैं।

दूसरी तरफ अदालत की तरफ से यह आदेश आया कि किसी भी जन-प्रतिनिध को किसी मामले में सजा मिलते ही उसकी सदस्यता समाप्त हो जायेगी। अदालत के इस रुख से भ्रष्ट नेताओं की नींद हराम हो गई है। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री एवं राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव सहित तमाम लोगों के खिलाफ रांची की विशेष सीबीआई अदालत फैसला सुनाने वाली है। कांगे्रसी नेता एवं राज्यसभा सदस्य रशीद मसूद के खिलाफ भी भ्रष्टाचार के एक मामले में फैसला आने वाला है। इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखते हुए केंद्रीय कैबिनेट ने आनन-फानन में एक ऐसा अध्यादेश पारित कर दिया जो भ्रष्ट जन-प्रतिनिधियों के लिए रक्षा कवच का काम करेगा।

समझ में नहीं आता कि एक तरफ सरकार कहती है कि वह भ्रष्टाचार के मामले में किसी भी प्रकार का समझौता नहीं करेगी किंतु दूसरी तरफ वह भ्रष्ट राजनीतिज्ञों की सदस्यता बचाने के लिए अध्यादेश ला रही है। सरकार किसको बचाना चाहती है, यह तो वही जाने किंतु इतना निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि सरकार का यह कदम जन-भावनाओं के अनुरूप नहीं है।

इन दो घटनाओं के अलावा एक और ऐसी घटना देखने को मिली, जिससे धार्मिक क्षेत्र में भी प्रश्न चिन्ह लग गया है। संत आसाराम की गिरफ्तारी से संत-महात्माओं के प्रति लोगों को निराशा हुई है। हालांकि, देशवासियों का यह स्पष्ट मत है कि सभी संत एक ही जैसे हैं, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता है लेकिन इस पूरे प्रकरण में एक बात यह कही जा रही है कि सरकार यदि कार्रवाई करे तो सबके खिलाफ करे, किसी के खिलाफ कार्रवाई हो और किसी के खिलाफ नहीं हो, इससे भी बात बनने वाली नहीं है। संत-महात्मा समाज को दिशा एवं मार्गदर्शन देने का काम करते हैं, किंतु जब वही लोग अपने मार्ग से भटक जायें तो बाकी लोगों से क्या उम्मीद की जाये?

इन सब बातों के बीच एक बात बहुत स्पष्ट रूप से कही जा रही है कि यदि राजनैतिक क्षेत्र का पूरी तरह शुद्धिकरण हो जाये तो बाकी क्षेत्र अपने आप ठीक हो जायेंगे। चूंकि, सरकार चलाने की जिम्मेदारी राजनैतिक वर्ग की है, इसलिए सबसे अधिक जिम्मेदारी इसी वर्ग की बनती है कि सभी क्षेत्रें पर निष्पक्ष रूप से नजर रखे। मगर वर्तमान समय में ऐसा देखने में मिलता है कि राजनैतिक लोगों से कोई उम्मीद ही नहीं की जा रही है इसलिए जरूरत इस बात की है कि सबसे पहले राजनैतिक क्षेत्र में शुद्धिकरण का अभियान चलाया जाये, बाकी क्षेत्र तो अपने आप ठीक होते चले जायेंगे। अतः वर्तमान समय की मांग यही है कि राजनैतिक क्षेत्र में शुचिता के लिए जितने भी कदम उठाये जा सकते हैं, उठाए जाने चाहिए।