भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में आज केन्द्र में एनडीए की सरकार है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी को पूरी दुनिया में मजबूत नेता के रूप में देखा जा रहा है। वर्तमान स्थिति में भारत पूरी दुनिया में फालोवर नहीं बल्कि एजेन्डा तय करने की भूमिका में है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि भारत लगातार विश्व गुरू बनने की दिशा में अग्रसर हो रहा है किन्तु भारतीय जनता पार्टी के यहां तक पहुंचने के इतिहास पर नजर डाली जाये तो इसका इतिहास बहुत लम्बा है।
दरअसल, जिस भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली केन्द्र में सरकार है उसका बीजारोपण डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 1951 में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सहयोग से ‘जनसंघ’ के रूप में की थी। 1951 से लेकर 1977 तक विभिन्न उतारों-चढ़ाओं को देखते हुए उसका विलय जनता पार्टी में हो गया। श्री मोरारजी देसाई की सरकार गिरने के बाद 6 अप्रैल 1980 को भारतीय जनता पार्टी की स्थापना हुई। स्व. अटल बिहारी वाजपेयी भाजपा के प्रथम अध्यक्ष बने। भारतीय जनता पार्टी को उसके स्थापना काल से ही कैडर बेस दल माना जाता रहा है। ‘जनसंघ’ एवं ‘भाजपा’ के नेताओं-कार्यकर्ताओं ने पूरे देश में जन-जागरण कर अपनी विचारधारा के प्रचार-प्रसार का कार्य किया और आम जनमानस को पार्टी का सदस्य बनने के लिए प्रेरित किया। ‘जनसंघ’ एवं उसके बाद ‘भाजपा’ से सदस्य के रूप में जो भी लोग जुड़े, विचारधारा से प्रेरित होकर जुड़े। स्वार्थ एवं लोभ का तो दूर-दूर तक नामो-निशान नहीं था क्योंकि उस समय यह सोचना एकदम असंभव था कि उनके जीवन काल में भारतीय जनता पार्टी कभी सरकार भी बना पायेगी इसलिए लोभ एवं स्वार्थ का कोई मतलब ही नहीं था।
लोकतंत्रा की विधिवत प्रक्रिया को अपनाते हुए समिति (बूथ), मंडल, जिला, प्रदेश एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव होता था। भारतीय जनता पार्टी के नेता एवं कार्यकर्ता बहुत गर्व से कहा करते थे कि ‘We are party with a difference’ यानी कि भाजपा अन्य दलों से अलग है। अन्य दलों से अलग का आशय इस बात से है कि कुछ मुद्दों पर भाजपा की स्पष्ट राय एवं नीति रही है। वोटों के लिहाज से मुद्दों पर वह कनफ्यूज नहीं है। उदाहरण के तौर पर राम मंदिर, धारा 370, तीन तलाक, समान नागरिक संहिता सहित कुछ अन्य मुद्दों पर भाजपा की स्पष्ट नीति रही है। उस समय जहां अन्य दलों में मनोनयन की प्रक्रिया थी, वहीं भाजपा में बूथ अध्यक्ष से लेकर राष्ट्रीय अध्यक्ष तक का चुनाव लोकतांत्रिक प्रक्रिया के द्वारा होता था। 1989 तक भारतीय जनता पार्टी में कमोबेश इस तरह की स्थिति बनी रही, तब तक पूरी तरह भाजपा को कैडर बेस पार्टी माना जाता था। चुनाव की प्रक्रिया नीचे से ऊपर को जाती थी।
वक्त के मुताबिक पार्टी में कुछ बदलाव की आवश्यकता शीर्ष नेतृत्व को महसूस हुई। इस समय तक कार्यकर्ताओं में तीन गुणों – चरित्रा, ईमानदारी और समर्पण को प्राथमिकता दी जाती थी। थोड़ी-बहुत बदलाव की आवश्यकता महसूस होने पर कार्यकर्ताओं के त्रिगुणों में शिथिलता देने की प्रक्रिया प्रारंभ हुई और सत्ता में आने के लिए पार्टी अपनी विचारधारा, सिद्धांतों एवं ऊच्च स्तरीय परंपराओं से किनारा करने लग गई। कहने का आशय यह है कि वक्त के मुताबिक पार्टी की नीतियों, विचारधारा, संगठन प्रक्रिया एवं त्रिगुणी कार्यकर्ताओं के मापदंडों पर शिथिलता आवश्यकता से अधिक बढ़ती गई। बदलाव के साथ अपने को ढालते रहना ठीक है किंतु एक सीमा तक। बदलाव का नतीजा यह हुआ कि ‘मिस्ड काल’ के माध्यम से भाजपा दुनिया में सर्वाधिक सदस्यों वाली पार्टी बन गई। ‘मिस्ड काॅल’ के द्वारा बनने वाले सदस्यों की प्रामाणिकता कितनी है, इस पर विस्तृत रूप से चर्चा हो सकती है।
पहले त्रिगुणी यानी चरित्रा, ईमानदारी और समर्पण से पूर्ण कार्यकर्ता पार्टी में किसी भी प्रकार की कमी आने पर अंकुश लगाने का कार्य करते थे किन्तु आज ऐसी स्थिति है कि पार्टी में जो नई खेप आई या अभी भी आ रही है, वह पार्टी का नेतृत्व कर रही है, निर्देश देने एवं नीति-निर्धारण का कार्य कर रही है। ऐसे लोगों में तमाम ऐसे लोग भी हैं जो अन्य दलों से भी आये हैं, जिनका पूरी तरह से प्रशिक्षण भी नहीं हुआ है। ऐसे में समस्या यह उत्पन्न हो रही है कि पुराने कार्यकर्ताओं, विशेषकर त्रिगुणी कार्यकर्ताओं को पहचानने से भी इनकार कर दे रहे हैं। हालांकि, इन कार्यकर्ताओं को आज भी पार्टी का स्तंभ यानी नींव का पत्थर माना जा रहा है किंतु व्यावहारिक धरातल पर कितना प्रभावी है, इस पर पर्याप्त बहस की संभावना है।
जिन कार्यकर्ताओं ने सदा से ही पार्टी को सींचने और संवारने का कार्य किया है, उनकी इतनी उपेक्षा एवं फजीहत क्यों हो रही है? इन परिस्थितियों में पार्टी को निरंतर ऊंचाइयों पर ले जाने वाले
त्रिगुणी कार्यकर्ताओं के मन में क्षोभ उत्पन्न हो रहा है। उनको लगता है कि हमें सुने, समझे और जाने बगैर दरकिनार किया जा रहा है। यह समस्या इस प्रकार की है कि जिसका समाधान नितांत आवश्यक है क्योंकि ‘समय बहुत बलवान होता है, हर दिन रविवार नहीं होता है’ यानी कि पार्टी का समय आज ठीक है किंतु जरूरी नहीं है कि हमेशा यही समय रहे।
यह भी अपने आप में सही है कि वर्तमान में जो भी कार्यकर्ता पार्टी से जुड़ रहे हैं, उनमें से अधिकांश लोभ एवं स्वार्थ से प्रेरित होकर जुड़ रहे हैं किंतु पहले जो भी कार्यकर्ता जुड़े थे वे निःस्वार्थ भाव से विचारधारा से प्रभावित होकर जुड़े थे। उन्होंने तो इस बात की कल्पना भी नहीं की थी कि पार्टी उनके जीवित रहते कभी सत्ता में भी आयेगी। वर्तमान परिस्थिति में ‘माल खाए मदारी – नाच करे बंदर’ एवं ‘कमाए धोती वाला – खाये टोपी वाला’ कहावत को खूब चरितार्थ होते देखा जा रहा है। ऐसी स्थिति में त्रिगुणी कार्यकर्ताओं को बहुत वेदना हो रही है किंतु वे विवश हैं।
जैसा कि मैंने ऊपर चर्चा में कहा है कि वर्ष 1989 से बदलाव का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह आज भी बदस्तूर जारी है। व्यक्तिगत तौर पर यह मैंने भी
महसूस किया और आकलन किया। वर्ष 1995 में झिंझौली (हरियाणा) में कार्यकर्ता प्रशिक्षण कार्यशाला में जाते समय माननीय लालकृष्ण आडवाणी जी से चर्चा करने का अवसर मिला था। मैंने उस समय श्री आडवाणी जी से निवेदन किया था कि पार्टी में जिस प्रकार गिरावट आ रही है और ‘क्वालिटी पर क्वांटिटी’ यानी
‘गुणवत्ता पर संख्या’ भारी पड़ रही है, ऐसे में कार्यकर्ताओं के श्रेणीकरण (ग्रेडिंग) का एक सिस्टम होना चाहिए।
हालांकि, पार्टी आज ‘पंच परमेश्वर’ एवं ‘पन्ना प्रमुख’ तक पहुंच चुकी है किंतु व्यक्तिगत स्तर पर इन ‘पंच परमेश्वरों’ एवं ‘पन्ना प्रमुखों’ की क्या स्थिति है, इस पर व्यापक चर्चा की जरूरत है। कार्यकर्ताओं की श्रेणीकरण (ग्रेडिंग) को आधार बनाकर यदि उनका कोई कार्ड या पहचान-पत्रा वरीयता, वरिष्ठता, समर्पण, ईमानदारी, उपयोगिता, निर्भरता, विश्वसनीयता आदि को ध्यान में रखकर मूल्यांकन कर ग्रेडेशन निर्धारित कर बन जाये तो कार्यकर्ता अपनी छोटी-मोटी समस्याओं का समाधान स्वतः कर लेगा क्योंकि श्रेणीकरण (ग्रेडिंग) हो जाने से जब वह किसी नेता या अधिकारी के पास जायेगा तो उसे किसी प्रकार की समस्या का सामना नहीं करना पड़ेगा।
भारतीय जनता पार्टी में जो भी कार्यकर्ता पहले आया है, निश्चित रूप से वह विचारधारा से प्रभावित होकर ही आया है। यह भी अपने आप में सत्य है कि वह निःस्वार्थ आया है, इसलिए वह स्वाभिमानी भी है। भारतीय सभ्यता-संस्कृति में प्राचीन काल से ही अपने वरिष्ठों एवं बुजुर्गों को सम्मान देने की परंपरा रही है। कार्यकर्ता चाहे किसी भी स्तर का हो किंतु उसके मान-सम्मान एवं स्वाभिमान की रक्षा होनी चाहिए।
अन्य दलों से तमाम नेता एवं कार्यकर्ता पार्टी में आ रहे हैं। निश्चित रूप से भारतीय जनता पार्टी में उनका शुद्धीकरण भी हो रहा है और साफ-सुथरे वातावरण में उन्हें कार्य करने का अवसर मिल रहा है किंतु ऐसे लागों को भाजपा के अतीत एवं उसके पुराने कार्यकर्ताओं की जानकारी पूरी तरह से नहीं हो पा रही है। ऐसे में वह किसी नेता के पास जाता है तो उसको न तो पर्याप्त सम्मान मिल पाता है और न ही वह अपना कार्य करवा पाता है। पार्टी में ऐसे भी तमाम कार्यकर्ता हैं जो अतीत में काफी सक्रिय थे और पार्टी को खड़ा करने में उनका बहुत महत्वपूर्ण योगदान रहा है किंतु आज वे किन्हीं कारणों से उतना सक्रिय नहीं हैं, किंतु समस्याएं उनकी भी हैं।
वर्तमान परिस्थितियों में जब वे किसी के पास जाते हैं और उन्हें यह बताना पड़ता है कि वे भी पार्टी के पुराने कार्यकर्ता हैं और उन्होंने भी पार्टी के विकास में अपना योगदान दिया है तो उन्हें बहुत अटपटा लगता है और मन को पीड़ा होती है क्योंकि ‘मन, शरीर और परिस्थितियां सक्रिय होकर कार्य करने की इजाजत हमेशा नहीं देतीं’, ऐसे में समस्या यह उठती है कि अपनी छोटी-छोटी समस्याओं के निदान के लिए वह किसके पास जाये और गिड़गिड़ाए?
ऐसे में आवश्यकता इस बात की है कि कार्यकर्ताओं का श्रेणीकरण (ग्रेडिंग) कर उसे किसी भी प्रकार का पहचान-पत्रा देना चाहिए। श्रेणीकरण (ग्रेडिंग) का आधार पार्टी जैसा चाहे, वैसा तय कर सकती है। चाहे पार्टी में कार्य किये गये समय के आधार पर, तजुर्बे के आधार पर, वरीयता के आधार पर, सक्रियता के आधार पर या फिर पार्टी में पद यानी दायित्व के आधार पर या सभी तरह के क्रिया-कलापों के आधार पर किंतु आज कार्यकर्ता को इस बात की आवश्यकता महसूस हो रही है।
किसी भी कार्यकर्ता के लिए यह संभव नहीं है कि उसका सब जगह परिचय हो या कोई संपर्क वाला हो। पार्टी का कार्यकर्ता होने के नाते वह जहां भी जायेगा अपना परिचय ही देगा। परिचय देने पर यदि किसी प्रकार का संशय हो तो उसे दूर किया जा सकता है। कार्यकर्ता यदि पार्टी के सिद्धांतों एवं विचारधारा पर खरा न उतरता हो तो उसके बारे में कुछ भी विचार किया जा सकता है किंतु जो लोग स्वाभाविक कार्यकर्ता रहे हों या अभी भी हों, उन्हें सम्मान मिलना चाहिए एवं उनकी समस्याओं का यथासंभव समाधान होना चाहिए।
कार्यकर्ता पार्टी की रीढ़ हैं, यदि उनके मान-सम्मान पर आंच आयेगी तो वे दुखी होंगे। परिवार के किसी भी व्यक्ति को दुख पहुंचे या तकलीफ में हो तो उसकी मदद करना पूरे परिवार की जिम्मेदारी बनती है। ठीक इसी प्रकार की स्थिति पार्टी की भी है। पार्टी भी एक परिवार की तरह है। मेरा तो व्यक्तिगत रूप से मानना है कि यदि कोई कार्यकर्ता अपना परिचय ‘पन्ना प्रमुख’ एवं ‘पंच परमेश्वर’ के रूप में देता है तो उसको भी उतना ही सम्मान मिलना चाहिए जितना कि एक प्रभावशाली कार्यकर्ता को मिलता है। इससे पार्टी में आदर्श स्थिति उत्पन्न होगी।
आज पार्टी में अर्थ के आधार पर अपने को जिन लोगों ने सक्षम बना लिया है या पार्टी ऐसे लोगों को सक्षम यानी चुनाव जीतने लायक मानती है, ऐसे लोग भी लहरों पर ही सवार होकर चुनावी वैतरणी पार करते हैं यानी पार्टी की हवा न हो तो तथाकथित सक्षम लोग भी चुनावी जंग में धराशायी हो जाते हैं। मेरे कहने का आशय यह है कि ‘लहरों के शहंशाह’ लहर देखकर पार्टियों में आना-जाना लगाये रखते हैं। जब लहरों के ही आधार पर चुनाव लड़ना एवं जीतना है तो क्यों न वफादार कार्यकर्ताओं पर यकीन किया जाये। सक्षमता के आधार पर आर्थिक रूप से कमजोर कार्यकर्ताओं का हक मारा जा रहा है। इसे ठीक नहीं कहा जा सकता है। ‘जिसकी चल रही है, उसे चलाते रहना चाहिए’ इस प्रकार की प्रवृत्ति पर रोक लगाने की आवश्यकता है क्योंकि हिन्दुस्तान में एक पुरानी कहावत है कि ‘मनुष्य बली नहीं होत है, समय होत है बलवान।’
यानी मनुष्य बलवान नहीं होता बल्कि उसका समय बलवान होता है। कार्यकर्ता ‘दिल के बजाय दिमाग’ से कार्य न करे, उसकी भावनाएं अन्तःकरण से पार्टी एवं नेतृत्व से जुड़ी रहें, इस प्रकार की कोशिश हम सभी को करनी है। पार्टी की पुरानी परंपरा एवं सिद्धांतों को लेकर ही आगे बढ़ना होगा। छोटा से छोटा कार्यकर्ता भी अपने को उपेक्षित न महसूस करे, इसके लिए हर स्तर से प्रयास करने की जरूरत है। पहले की भांति दोतरफा संवाद की आवश्यकता है। किस कार्यकर्ता में किस प्रकार की क्षमता है उसका आंकलन करने की आवश्यकता है। कार्यकर्ता की पहचान एवं परख के लिए तीसरी आंख की आवश्यकता है। कुल मिलाकर मेरा कहने का आशय यही है कि किसी भी सूरत में कार्यकर्ता के मान-सम्मान एवं स्वाभिमान की रक्षा होनी चाहिए, उसके लिए पार्टी जो भी उपाय कर सके, करना चाहिए। जिस प्रकार सक्रिय सदस्यों के सत्यापन के लिए समिति गठित की जाती है, उसी प्रकार कार्यकर्ता के मूल्यांकन यानी ग्रेडिंग के लिए भी समिति का गठन किया जा सकता है। ऐसा करना पार्टी एवं कार्यकर्ता दोनों के लिए हितकर होगा।
– अरूण कुमार जैन (इंजीनियर)
(लेखक राम-जन्मभूमि न्यास के
ट्रस्टी रहे हैं और भा.ज.पा. केन्द्रीय
कार्यालय के कार्यालय सचिव रहे हैं)